UAPA में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- Article 21 से ऊपर नहीं कानून

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Article 21 बनाम UAPA पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी‘जेल अपवाद है’

सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में जमानत को लेकर बड़ा फैसला देते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के Article 21 से संरक्षित है और Section 43-D(5) UAPA उसे खत्म नहीं कर सकता। कोर्ट ने K.A. Najeeb फैसले को बाध्यकारी मिसाल बताया।


UAPA मामलों में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, ‘जेल अपवाद है’ सिद्धांत दोहराया

Article 21 बनाम UAPA पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

पीठ ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43-D(5) अदालतों की जमानत देने की शक्ति को सीमित जरूर करती है, लेकिन यह संवैधानिक स्वतंत्रता को समाप्त नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत जमानत से जुड़े मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 के महत्व को दोहराते हुए कहा है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी भी कानून से ऊपर संवैधानिक संरक्षण प्राप्त अधिकार है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) का सिद्धांत नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से निकला मूल संवैधानिक सिद्धांत है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43-D(5) अदालतों की जमानत देने की शक्ति को सीमित जरूर करती है, लेकिन यह संवैधानिक स्वतंत्रता को समाप्त नहीं कर सकती।


K.A. Najeeb फैसले को बताया बाध्यकारी कानून

सुप्रीम कोर्ट ने अपने तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ के ऐतिहासिक फैसले Union of India v. K.A. Najeeb (2021) को फिर से पुष्ट करते हुए कहा कि यह अब भी बाध्यकारी कानून है और इसे निचली अदालतें, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की छोटी पीठें कमजोर नहीं कर सकतीं।

अदालत ने कहा कि K.A. Najeeb फैसले का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि लंबी अवधि तक मुकदमे लंबित रहने की स्थिति में आरोपी की स्वतंत्रता पूरी तरह खत्म न हो जाए।

पीठ ने कहा:

“जब यह स्पष्ट हो जाए कि मुकदमा समय पर पूरा नहीं होगा और आरोपी लंबे समय से जेल में है, तो अदालतों पर सामान्यतः जमानत देने का दायित्व बनता है।”


Gulfisha Fatima फैसले पर कोर्ट ने जताई गंभीर आपत्ति

खंडपीठ ने हालिया फैसले Gulfisha Fatima v. State (NCT of Delhi) पर गंभीर आपत्तियां व्यक्त कीं।

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कोर्ट ने कहा कि उस फैसले में K.A. Najeeb के सिद्धांत को अत्यधिक सीमित और अपवादात्मक स्थिति तक सीमित कर दिया गया, जिससे उसके संवैधानिक महत्व को “कमजोर” करने की कोशिश दिखाई देती है।

पीठ ने कहा कि Najeeb फैसले को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि केवल “अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों” में ही लंबी कैद जमानत का आधार बने।

अदालत ने टिप्पणी की:

“Section 43-D(5) का उपयोग Article 21 पर हावी होने के लिए नहीं किया जा सकता।”


‘बेल नियम, जेल अपवाद’ संवैधानिक सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” केवल एक कानूनी नारा नहीं है।

पीठ के अनुसार, यह सिद्धांत निर्दोषता की धारणा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक ढांचे से जुड़ा हुआ है।

हालांकि अदालत ने माना कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मामलों में UAPA जैसे विशेष कानून कठोर प्रतिबंध लगा सकते हैं, लेकिन वे संविधान और मौलिक अधिकारों को उलट नहीं सकते।


छोटी पीठ बड़ी पीठ के फैसले को कमजोर नहीं कर सकती

फैसले में न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई।

अदालत ने कहा कि छोटी पीठें बड़ी पीठों के फैसलों से बंधी होती हैं। यदि उन्हें किसी बड़े फैसले से असहमति हो तो उन्हें मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना चाहिए, न कि उसके प्रभाव को कमजोर करना चाहिए।

पीठ ने कहा:

“छोटी पीठ किसी बड़ी पीठ के निर्णय को कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकती।”

कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि दो-न्यायाधीशों वाली पीठ होने के नाते वह तीन-न्यायाधीशों की पीठ के K.A. Najeeb फैसले से बाध्य है।


क्या था मामला?

यह मामला जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा निवासी और ग्रामीण विकास विभाग के कर्मचारी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी से जुड़ा था।

अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद 2019 में उन्हें जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत हिरासत में लिया गया था। बाद में उनकी नजरबंदी रद्द कर दी गई।

इसके बाद 2020 में NDPS Act के तहत उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ और बाद में जांच NIA को सौंप दी गई।

NIA ने आरोप लगाया कि उनके मोबाइल फोन से पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से जुड़े नंबर मिले और नकदी व मादक पदार्थ बरामद हुए। उन पर UAPA, NDPS Act और IPC की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए।

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कोर्ट बोली— आतंक वित्तपोषण का आधार कमजोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपी मादक पदार्थों की खरीद-बिक्री में शामिल था या उसके पास से बरामदगी कानूनी रूप से सिद्ध हुई हो।

अदालत ने कहा कि जब NDPS से जुड़े आरोपों का आधार कमजोर हो जाता है, तो आतंक वित्तपोषण (Terror Funding) का आरोप भी स्वतः कमजोर पड़ जाता है।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमे के अंतिम परिणाम पर कोई टिप्पणी नहीं की जा रही है और अभियोजन को ट्रायल में अपने आरोप साबित करने होंगे।


सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने ट्रायल लंबित रहने के दौरान जमानत पाने का मामला बना लिया है।

इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि विशेष NIA कोर्ट उचित शर्तों के साथ आरोपी को जमानत पर रिहा करे।


UAPA जमानत कानून पर दूरगामी असर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला UAPA मामलों में जमानत के न्यायशास्त्र को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है।

फैसले ने स्पष्ट संकेत दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में भी अदालतें संविधान के अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।


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