लंबित आपराधिक मामला अधिवक्ता नामांकन सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने लंबित आपराधिक मामले के आधार पर कानून स्नातक का अधिवक्ता के रूप में नामांकन (Enrolment) रोकने पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से कानूनी आधार पूछा। अदालत ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट में केवल लंबित मामले के आधार पर नामांकन से इनकार का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा लंबित आपराधिक मामले का सामना कर रहे एक कानून स्नातक का अधिवक्ता के रूप में नामांकन (Enrolment) करने से इनकार किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अदालत ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिसके तहत केवल किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में नामांकित करने से रोका जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI से पूछा कि वह अपने इस रुख का कानूनी आधार स्पष्ट करे।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला के.आर. सुदर्शन (K.R. Sudersan) की याचिका से संबंधित है, जो पेशे से एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं और जिन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद अधिवक्ता के रूप में नामांकन के लिए आवेदन किया था।
हालांकि, तमिलनाडु एवं पुडुचेरी बार काउंसिल ने उनके विरुद्ध लंबित एक आपराधिक मामले का हवाला देते हुए उनका नामांकन करने से इनकार कर दिया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने की।
बार काउंसिल ने नामांकन क्यों रोका?
बार काउंसिल ने अपने निर्णय के समर्थन में मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों का हवाला दिया।
इन निर्देशों में राज्य बार काउंसिलों से कहा गया था कि जब तक संसद कानून में संशोधन नहीं करती, तब तक लंबित आपराधिक मामलों का सामना कर रहे कानून स्नातकों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन न किया जाए।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल ने दलील दी कि—
- के.आर. सुदर्शन 50 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं।
- उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप एक कंपनी को वित्तीय अनियमितता से जुड़े मामले में पेशेवर सलाह देने से संबंधित हैं।
- उन्हें किसी भी आपराधिक मामले में दोषी (Convicted) नहीं ठहराया गया है।
- एडवोकेट्स एक्ट की धारा 24A केवल कुछ विशेष अपराधों में दोषसिद्ध (Conviction) होने की स्थिति में ही अधिवक्ता बनने से अयोग्य ठहराती है।
- कानून में कहीं भी केवल लंबित आपराधिक मामले (Pending Criminal Case) को नामांकन से इनकार का आधार नहीं बनाया गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि मद्रास हाईकोर्ट ने स्वयं इस व्यापक कानूनी प्रश्न को पुनर्विचार के लिए पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष भेज दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने BCI से पूछा कि जब कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है तो केवल लंबित मामले के आधार पर नामांकन कैसे रोका जा सकता है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अतीत में गंभीर आपराधिक मामलों में दोषसिद्ध व्यक्तियों का भी अधिवक्ता के रूप में नामांकन हुआ है। ऐसे में केवल लंबित मुकदमे के आधार पर नामांकन से इनकार करना असंगत प्रतीत होता है।
न्यायमूर्ति मेहता ने यह भी कहा कि अदालत की बड़ी चिंता यह है कि BCI कुछ ऐसे विधि महाविद्यालयों को भी मान्यता दे रही है, जिनके बारे में आरोप है कि वे अनुपयुक्त परिसरों, जैसे गैरेज, से संचालित हो रहे हैं।
BCI ने क्या कहा?
BCI की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. गुरुकृष्णकुमार ने अदालत को बताया कि बार काउंसिल ने मद्रास हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए नामांकन से इनकार किया था।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि एडवोकेट्स एक्ट की धारा 24A में केवल लंबित आपराधिक मामले के आधार पर अधिवक्ता बनने से अयोग्य घोषित करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या अंतरिम राहत दी?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु एवं पुडुचेरी बार काउंसिल को निर्देश दिया कि—
- के.आर. सुदर्शन का दो सप्ताह के भीतर अंतरिम (Provisional) अधिवक्ता नामांकन किया जाए।
- उन्हें अधिवक्ता नामांकन प्रमाणपत्र (Enrolment Certificate) जारी किया जाए।
साथ ही अदालत ने—
- BCI और राज्य बार काउंसिल को दो महीने के भीतर जवाब (Counter Affidavit) दाखिल करने का समय दिया।
- याचिकाकर्ता को उसके बाद एक महीने में प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने की अनुमति दी।
अंतरिम नामांकन अंतिम निर्णय पर निर्भर रहेगा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का यह अंतरिम नामांकन मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।
यदि अंतिम फैसले में कोई अलग निष्कर्ष निकलता है तो उसका प्रभाव इस अंतरिम नामांकन पर भी पड़ेगा।
फैसले का महत्व
यह मामला एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 24A की व्याख्या और अधिवक्ता नामांकन से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को सामने लाता है। यदि सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट करता है कि केवल लंबित आपराधिक मामला अधिवक्ता बनने में बाधा नहीं है, तो इसका प्रभाव देशभर में हजारों कानून स्नातकों और सभी राज्य बार काउंसिलों की नामांकन प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
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