लखनऊ में करीब 900 अधिवक्ताओं पर 575 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बीच वकीलों के आपराधिक रिकॉर्ड, बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और बार काउंसिल की जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।
लखनऊ में वकीलों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों ने बढ़ाई चिंता
कानून की रक्षा और न्याय दिलाने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज बड़ी संख्या में आपराधिक मुकदमों ने न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और कानूनी पेशे की शुचिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लखनऊ में करीब 900 अधिवक्ताओं के खिलाफ कुल 575 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें जमीन कब्जा, हत्या के प्रयास, मारपीट, धमकी, धोखाधड़ी तथा अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मामले शामिल हैं।
67 अधिवक्ताओं पर तीन या उससे अधिक मुकदमे
आंकड़ों के अनुसार—
- 67 अधिवक्ताओं पर तीन या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
- जानकीपुरम क्षेत्र का एक अधिवक्ता हिस्ट्रीशीटर घोषित है, जिसके खिलाफ 27 मुकदमे दर्ज हैं।
- इसके अलावा कई अधिवक्ताओं पर 13, 12 और 10 तक आपराधिक मुकदमे दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
किन थानों में सबसे अधिक मामले दर्ज हैं?
थाना-वार आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक मुकदमे वजीरगंज क्षेत्र में दर्ज हैं।
| थाना | अधिवक्ता | दर्ज मुकदमे |
|---|---|---|
| वजीरगंज | 422 | 236 |
| विभूतिखंड | 50 | 33 |
| मड़ियांव | 36 | 25 |
| कैसरबाग | 57 | 24 |
| निगोहां | 10 | 20 |
| हजरतगंज | 26 | 19 |
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर मांगी रिपोर्ट
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ के समक्ष इटावा के अधिवक्ता मोहम्मद कफील की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह जानकारी सामने आई कि उत्तर प्रदेश में 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।
इस पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पूरे प्रदेश में अधिवक्ताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच कराने तथा विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
पहले भी हाईकोर्ट दे चुका है निर्देश
दिसंबर 2025 में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) के माध्यम से प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस आयुक्तों को निर्देश दिया था कि—
- बार काउंसिल में पंजीकृत ऐसे अधिवक्ताओं का विस्तृत डेटाबेस तैयार किया जाए,
- जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं।
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद पुलिस ने विशेष सेल गठित कर अधिवक्ताओं से जुड़े मामलों का रिकॉर्ड तैयार करना और समय-समय पर न्यायालय को रिपोर्ट भेजना शुरू किया।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पहले भी जता चुके हैं चिंता
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालय समय-समय पर अधिवक्ताओं के आपराधिक इतिहास की जांच तथा कानूनी पेशे की गरिमा बनाए रखने के लिए क्रिमिनल बैकग्राउंड चेक सिस्टम लागू करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर अधिवक्ता नामांकन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से पूछा था कि केवल लंबित मुकदमे के आधार पर नामांकन रोकने का कानूनी आधार क्या है।
जमीन कब्जे के आरोपों में वकीलों के गुट सक्रिय होने का दावा
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 50 से 100 लोगों के समूह में सक्रिय कुछ अधिवक्ताओं के गिरोहों पर जमीन, मकान और दुकानों पर कब्जा कराने जैसे मामलों में शामिल होने के आरोप हैं।
आरोप है कि ये समूह बड़ी संख्या में मौके पर पहुंचकर दबाव बनाते हैं और विरोध करने वालों को स्वयं को अधिवक्ता बताकर डराने का प्रयास करते हैं।
इन समूहों में कुछ महिला अधिवक्ताओं के शामिल होने का भी दावा किया गया है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, दो महिला अधिवक्ताओं के खिलाफ चार या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
पूर्व DGP और बार एसोसिएशन अध्यक्ष ने क्या कहा?
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) विक्रम सिंह ने कहा कि—
अधिवक्ताओं की न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में बार काउंसिल को सुनिश्चित करना चाहिए कि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों से दूरी बनाए रखी जाए।
वहीं, सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल ने कहा कि—
बिना अनुमति चल रहे लॉ कॉलेजों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही बार काउंसिल को अधिवक्ताओं का पंजीकरण करने से पहले उनका समुचित सत्यापन (Verification) कराना चाहिए। यदि कोई झूठा शपथपत्र देता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
चर्चित घटनाएं
- 12 सितंबर 2023: पुलिस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शन के दौरान बैरिकेडिंग तोड़ने और पुलिस से धक्का-मुक्की के आरोप में हजरतगंज थाने में मुकदमा दर्ज हुआ।
- 20 दिसंबर 2022: वजीरगंज क्षेत्र में जमीन विवाद के मामले में एक अधिवक्ता पर मारपीट और कब्जे का आरोप लगने के बाद मुकदमा दर्ज किया गया।
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश
- मामले की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं.
- किसी भी अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई उसके गृह जिले से कम से कम 100 किलोमीटर दूर स्थित दूसरे जिले की अदालत में स्थानांतरित की जाए.
- फर्जी डिग्री वाले 105 अधिवक्ताओं के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और अन्य संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज की जाए.
- गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर उनके लाइसेंस निलंबित करने पर विचार किया जाए.
- प्रदेश के 5.37 लाख पंजीकृत अधिवक्ताओं का ऑडिट कराया जाए, ताकि फर्जी नामांकन और “घोस्ट एडवोकेट्स” की पहचान हो सके.
- जिन 2.6 लाख अधिवक्ताओं ने अब तक प्रैक्टिस प्रमाणपत्र नहीं लिया है, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर उनका नामांकन समीक्षा के दायरे में लाया जाए.
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया से नियमों में संशोधन कर पुलिस वेरिफिकेशन को अधिवक्ता के नामांकन के लिए अनिवार्य करने की सिफारिश की जाए.
मामले का महत्व
लखनऊ और उत्तर प्रदेश से सामने आए ये आंकड़े अधिवक्ताओं की पेशेवर नैतिकता (Professional Ethics), बार काउंसिल की जवाबदेही, लॉ कॉलेजों की गुणवत्ता, और अधिवक्ताओं के बैकग्राउंड वेरिफिकेशन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आए हैं। हालांकि, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना मात्र उसे दोषी सिद्ध नहीं करता। जब तक सक्षम न्यायालय दोष सिद्ध न कर दे, प्रत्येक आरोपी कानून की दृष्टि में निर्दोष माना जाता है।
मामला: डॉ. कफील खान बनाम उत्तर प्रदेश सरकार
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