तेलंगाना हाई कोर्ट HYDRAA कमिश्नर आदेश
तेलंगाना हाई कोर्ट ने अदालत के आदेशों की बार-बार अवहेलना पर HYDRAA कमिश्नर ए.वी. रंगनाथ को तत्काल पद से हटाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने उनकी तुलना ग्रीक पौराणिक जल-राक्षस ‘हाइड्रा’ से करते हुए कानून के शासन पर गंभीर चिंता जताई।
HYDRAA कमिश्नर को तत्काल हटाने का हाई कोर्ट का निर्देश
तेलंगाना हाई कोर्ट ने हैदराबाद डिजास्टर रिस्पॉन्स एंड एसेट प्रोटेक्शन एजेंसी (HYDRAA) और उसके कमिश्नर ए.वी. रंगनाथ के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को उन्हें तत्काल पद से हटाने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार जुकांती ने कहा कि कमिश्नर द्वारा अदालत के आदेशों की बार-बार और व्यवस्थित तरीके से अवहेलना की गई है, जो न्यायपालिका और कानून के शासन के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
अदालत ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि उनके स्थान पर जल्द से जल्द किसी उपयुक्त अधिकारी की नियुक्ति की जाए।
सिर्फ डेढ़ साल में अवमानना के 63 मामले
हाई कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया कि मात्र डेढ़ वर्ष के भीतर एक आईजी रैंक के आईपीएस अधिकारी के खिलाफ अदालत की अवमानना के 63 मामले दर्ज हुए।
रजिस्ट्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में हाई कोर्ट में 9,200 से अधिक अवमानना याचिकाएं दायर हुईं, जिनमें से 63 मामले केवल HYDRAA से संबंधित थे।
अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में न्यायालय के आदेशों की अनदेखी अत्यंत गंभीर स्थिति को दर्शाती है।
HYDRAA की तुलना ग्रीक पौराणिक ‘हाइड्रा’ से
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने HYDRAA की तुलना ग्रीक पौराणिक कथाओं के बहु-सिर वाले जल-राक्षस ‘हाइड्रा’ (Hydra) से की।
अदालत ने कहा कि जिस प्रकार हाइड्रा के कटे हुए सिर दोबारा उग आते थे और वह लगभग अजेय माना जाता था, उसी प्रकार यदि अदालत ऐसी संस्था को नागरिकों के अधिकारों पर हावी होने दे, तो यह न्यायपालिका के लिए अत्यंत घातक होगा।
कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका का दायित्व नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है और किसी भी सरकारी संस्था को न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अवैध तोड़फोड़ के मामले में सुनवाई
यह आदेश सिकंदराबाद के लोथकुंटा स्थित शांता श्रीराम कंस्ट्रक्शंस की लगभग 40 एकड़ भूमि पर कथित रूप से अदालत के आदेशों का उल्लंघन करते हुए की गई तोड़फोड़ से जुड़े अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान पारित किया गया।
अदालत ने कहा कि यदि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है, तो उसकी भरपाई HYDRAA को स्वयं करनी होगी।
हलफनामे पर अदालत की नाराजगी
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ए. सुदर्शन रेड्डी ने अदालत से अवमानना की कार्यवाही समाप्त करने का अनुरोध किया।
वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एम. हरीश कुमार ने कहा कि दायर हलफनामे में यह नहीं बताया गया कि—
- संरचनाओं को क्यों गिराया गया,
- याचिकाकर्ता को हिरासत में लेने का आधार क्या था,
- उसके खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज की गई।
इन कमियों पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने मामले की सुनवाई दोपहर तक स्थगित कर दी और महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए।
माफी स्वीकार करने से किया इनकार
दोपहर में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अनिल कुमार जुकांती ने कहा कि यद्यपि अवमानना मामले में महाधिवक्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक नहीं थी, लेकिन अधिकारी के वरिष्ठ पद को देखते हुए उन्हें बुलाया गया।
अदालत ने कहा कि बार-बार न्यायालय के आदेशों की अवहेलना अत्यंत गंभीर विषय है और सरकार को अपने अधिकारियों को न्यायालय के आदेशों का सम्मान करने के लिए स्पष्ट निर्देश देने चाहिए।
‘देर से मांगी गई माफी सच्चा पश्चाताप नहीं’
अदालत ने HYDRAA कमिश्नर द्वारा मांगी गई माफी स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि माफी तभी स्वीकार की जा सकती है जब वह समय पर, स्वेच्छा से और वास्तविक पश्चाताप के साथ मांगी जाए।
अदालत ने टिप्पणी की कि यदि माफी केवल तब मांगी जाए जब अधिकारी को यह लगे कि अदालत अब दंड देने वाली है, तो ऐसी माफी वास्तविक पश्चाताप नहीं बल्कि दंड से बचने का प्रयास मानी जाएगी।
HYDRAA की शक्तियों पर भी उठाए सवाल
हाई कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब संबंधित संपत्ति से जुड़े विवाद का विभिन्न न्यायिक स्तरों पर पहले ही अंतिम निर्णय हो चुका था और डिवीजन बेंच ने भी उसे बरकरार रखा था, तब HYDRAA ने उस निजी संपत्ति में प्रवेश कर तोड़फोड़ किस अधिकार से की।
अदालत ने कहा कि HYDRAA का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से सरकारी संपत्तियों, जैसे सड़कें, नहरें और राज्य सरकार या ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (GHMC) के अधीन आने वाली परिसंपत्तियों की सुरक्षा तक सीमित है।
फैसले का महत्व
यह आदेश स्पष्ट करता है कि कोई भी सरकारी अधिकारी या एजेंसी न्यायालय के आदेशों से ऊपर नहीं है। हाई कोर्ट ने दोहराया कि अदालत की अवमानना, न्यायिक आदेशों की लगातार अनदेखी और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई कानून के शासन (Rule of Law) के लिए गंभीर खतरा है। यह फैसला सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही और न्यायपालिका के आदेशों के पालन के महत्व को रेखांकित करता है।
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