बटालियन सीनियरिटी नियम अवैध, राष्ट्रपति आदेश को सर्वोच्चता प्राप्त: हाईकोर्ट

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हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 371-D के तहत राष्ट्रपति आदेश को सर्वोच्चता प्राप्त है; बटालियन-आधारित सीनियरिटी और प्रमोशन नियम असंवैधानिक ठहराए गए।


सेवा नियमों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए Telangana High Court ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 371-D के तहत जारी राष्ट्रपति आदेश को सर्वोच्च वैधानिक शक्ति प्राप्त है और इसके विपरीत बनाए गए नियम लागू नहीं किए जा सकते।


🔹 मामला क्या था

यह विवाद तेलंगाना स्टेट स्पेशल पुलिस (TSSP) बटालियनों में नियुक्ति, वरिष्ठता (seniority) और पदोन्नति (promotion) से जुड़े सेवा नियमों को लेकर था।

याचिकाकर्ता, जो असिस्टेंट रिजर्व सब-इंस्पेक्टर (ARSI) के पद पर कार्यरत थे, ने अदालत में चुनौती दी कि:

  • पदोन्नति बटालियन-वार सीनियरिटी के आधार पर की जा रही है
  • इससे उनके प्रमोशन के अवसर सीमित हो रहे हैं

उनका तर्क था कि संबंधित पद “स्टेट कैडर” के अंतर्गत आते हैं, इसलिए सीनियरिटी पूरे राज्य स्तर पर तय होनी चाहिए।


🔹 विवादित नियम और सरकारी आदेश

राज्य सरकार द्वारा जारी:

  • GOMs No. 69 (7 अप्रैल 1997)
  • GOMs No. 85 (28 अप्रैल 1997)

के तहत बटालियन-आधारित सीनियरिटी और प्रमोशन का प्रावधान किया गया था।

याचिकाकर्ता ने इन्हें संविधान के प्रावधानों के विपरीत बताया।


🔹 कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

मुख्य न्यायाधीश Aparesh Kumar Singh और जस्टिस G. M. Mohiuddin की खंडपीठ ने कहा कि:

  • Article 371-D के तहत जारी राष्ट्रपति आदेश
    • एक संवैधानिक साधन (constitutional instrument) है
    • इसे अधीनस्थ कानून (subordinate legislation) से बदला नहीं जा सकता
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अदालत ने पाया कि:

  • स्पेशल पुलिस बटालियनों के गैर-मंत्रालयिक पद
  • स्थानीय कैडर से बाहर हैं
  • इसलिए इन्हें स्टेट कैडर माना जाएगा

🔹 बटालियन-वार सीनियरिटी असंवैधानिक

कोर्ट ने कहा कि:

  • बटालियन-आधारित सीनियरिटी और प्रमोशन
  • राष्ट्रपति आदेश के विपरीत है

इसलिए संबंधित नियम उस सीमा तक अमान्य (unenforceable) हैं।


🔹 “सतत गलत” (Continuing Wrong) का सिद्धांत लागू

राज्य की ओर से देरी (delay) का तर्क भी रखा गया था, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि:

  • हर बार गलत सीनियरिटी के आधार पर प्रमोशन
  • एक नया कारण-ए-कार्रवाई (cause of action) पैदा करता है

इसलिए याचिका को विलंब के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।


🔹 प्रशासनिक संतुलन पर भी जोर

हालांकि अदालत ने यह भी माना कि:

  • नियमों को पूरी तरह रद्द करने से प्रशासनिक अव्यवस्था हो सकती है

इसलिए कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए:

  • नियमों को पूरी तरह निरस्त नहीं किया
  • बल्कि उन्हें आंशिक रूप से अमान्य घोषित किया

🔹 कोर्ट के निर्देश

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए:

  1. 6 महीने के भीतर नए नियम बनाए जाएं
    • जो राष्ट्रपति आदेश के अनुरूप हों
    • और राज्य-स्तरीय सीनियरिटी सुनिश्चित करें
  2. याचिकाकर्ता के मामले पर पुनर्विचार
    • 4 महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए
  3. अंतरिम रोक
    • तब तक केवल बटालियन-वार सीनियरिटी के आधार पर प्रमोशन न दिए जाएं

🔹 कानूनी महत्व

यह फैसला स्पष्ट करता है कि:

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🔹 निष्कर्ष

इस निर्णय से सेवा कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया गया है—कि प्रशासनिक सुविधा के नाम पर संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

अब राज्य सरकार के लिए चुनौती होगी कि वह नए नियम बनाकर इस असंगति को दूर करे और प्रभावित कर्मचारियों को न्याय दिलाए।


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