पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और संस्थाओं की आलोचना आवश्यक है, लेकिन सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते समय भारत की छवि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज दुनिया भारत को सम्मान की दृष्टि से देखती है।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी, लेकिन देश की गरिमा भी बनी रहनी चाहिए
भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और उसकी संस्थाओं की आलोचना आवश्यक है, क्योंकि इससे सत्ता में बैठे लोगों पर जवाबदेही बनी रहती है। हालांकि उन्होंने आगाह किया कि आलोचना करते समय, विशेषकर सोशल मीडिया पर, भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए।
साल्वे सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा आयोजित ए.के. सेन स्मृति व्याख्यान एवं चित्र अनावरण समारोह को संबोधित कर रहे थे।
‘आज दुनिया भारत को सम्मान की नजर से देखती है’
हरीश साल्वे ने कहा कि विदेश में रहने के कारण उन्हें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि आज विश्व समुदाय भारत को पहले की तुलना में कहीं अधिक सम्मान की दृष्टि से देखता है।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी दुनिया इस समय अनेक चुनौतियों से गुजर रही है। यूरोप अस्थिरता महसूस कर रहा है और अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद, जब भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की बात आती है तो कई देशों के लिए उसे स्वीकार करना आसान नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
‘सोशल मीडिया पर भारत को बदनाम करने से बचें’
साल्वे ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं की तीखी आलोचना भी आवश्यक है, लेकिन नागरिकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी अभिव्यक्ति से देश की प्रतिष्ठा प्रभावित न हो।
उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया के दौर में कही गई हर बात पूरी दुनिया तक पहुंचती है। इसलिए आलोचना करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि देश के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।
ए.के. सेन के चित्र का हुआ अनावरण
यह कार्यक्रम दिवंगत वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री ए.के. सेन के चित्र के अनावरण के लिए आयोजित किया गया था।
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और हरीश साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट की लाइब्रेरी नंबर-1 में उनके चित्र का संयुक्त रूप से अनावरण किया।
इस अवसर पर भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह सहित विधि जगत की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।
मुख्य न्यायाधीश ने ए.के. सेन की विरासत को किया याद
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ए.के. सेन एक विद्वान, उत्कृष्ट अधिवक्ता और दूरदर्शी राजनेता थे, जिनका पूरा जीवन कानून के माध्यम से राष्ट्र की सेवा को समर्पित रहा।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पुस्तकालय में उनका चित्र केवल श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के वकीलों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी होगा।
‘वकालत केवल पेशा नहीं, गणराज्य के प्रति दायित्व है’
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्रत्येक अधिवक्ता, जो पुस्तकालय से होकर गुजरेगा, उसे यह चित्र याद दिलाएगा कि वकालत केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पूरी करने का माध्यम नहीं, बल्कि न्याय और संविधान की सेवा का पवित्र दायित्व है।
उन्होंने कहा कि यह चित्र युवा वकीलों को स्वयं से महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करेगा, जैसे—
- क्या मैंने मुकदमे की पर्याप्त तैयारी की है?
- क्या मैं अदालत और विपक्ष के प्रति निष्पक्ष रहा हूं?
- क्या मैंने कानून का उपयोग न्याय स्पष्ट करने के लिए किया है या उसे और जटिल बनाने के लिए?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ए.के. सेन की विरासत यह सिखाती है कि प्रतिभा, संतुलन, सेवा और मानवीय संवेदनाओं के बिना अधूरी है।
बयान का महत्व
हरीश साल्वे का वक्तव्य लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर देता है। वहीं, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का संबोधन इस बात को रेखांकित करता है कि विधि व्यवसाय केवल कानूनी विशेषज्ञता तक सीमित नहीं, बल्कि न्याय, नैतिकता और सार्वजनिक सेवा के मूल्यों से भी संचालित होना चाहिए।
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