‘सड़कें मवेशियों के लिए नहीं हैं’, दुर्घटनाएं रोकने और मुआवजा नीति बनाने के निर्देश: सुप्रीम कोर्ट

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आवारा पशु सड़क हादसा मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवारा पशु सड़क पर ‘प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर’ नहीं हैं। केंद्र और राज्यों को ऐसी दुर्घटनाएं रोकने तथा पीड़ितों के लिए मुआवजा व्यवस्था बनाने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने मृतक की पत्नी को ₹15 लाख मुआवजा दिया।

आवारा पशु सड़क पर ‘प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर’ नहीं, दुर्घटनाएं रोकने और मुआवजा नीति बनाने के निर्देश: सुप्रीम कोर्ट

केंद्र और राज्यों से व्यापक नीति बनाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि आवारा पशु सड़कों पर ‘प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर’ बनने के लिए नहीं हैं और देशभर में मवेशियों से जुड़ी सड़क दुर्घटनाएं लगातार बढ़ती चिंता का विषय बन चुकी हैं। अदालत ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से ऐसी दुर्घटनाओं की रोकथाम तथा पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए व्यापक और प्रभावी तंत्र (Comprehensive Mechanism) विकसित करने का आह्वान किया।

मृतक की पत्नी को ₹15 लाख मुआवजा

जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने आवारा सांड के हमले में घायल होकर बाद में मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्ति की पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए ₹15 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि चार सप्ताह के भीतर अदा की जाए।

साथ ही, फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के सदस्य सचिवों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश भी दिया गया।

‘सड़कें मवेशियों के लिए नहीं हैं’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में मवेशियों से जुड़ी दुर्घटनाओं की खबरें अब आम हो चुकी हैं।

अदालत ने टिप्पणी की,

“भारत भले ही कृषि प्रधान देश हो और मवेशियों का महत्वपूर्ण स्थान हो, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय राजमार्गों, सड़कों और गलियों में मनमाने ढंग से प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर के रूप में नहीं छोड़ा जा सकता।”

कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाओं में केवल लोगों की जान ही नहीं जाती, बल्कि पशुओं को भी अनावश्यक पीड़ा झेलनी पड़ती है।

संविधान के अनुच्छेद 48 और 51A(g) का उल्लेख

अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 48 राज्य को पशुपालन और गौवंश संरक्षण की जिम्मेदारी देता है, जबकि अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक पर सभी जीवों के प्रति करुणा रखने का संवैधानिक कर्तव्य डालता है।

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पीठ ने कहा कि इन संवैधानिक मूल्यों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इन्हें व्यवहार में लागू करना आवश्यक है।

मौजूदा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, कैटल ट्रेसपास एक्ट तथा विभिन्न राज्यों के पशु कल्याण संबंधी कानूनों और योजनाओं का विस्तृत विश्लेषण किया।

अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने कानून और योजनाएं तो बनाई हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होने के कारण आवारा पशुओं की समस्या लगातार बढ़ रही है।

पशु मालिकों की जिम्मेदारी तय की

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई पशु आर्थिक रूप से उपयोगी नहीं रह जाता, तो उसके मालिक उसे सड़कों पर नहीं छोड़ सकते।

अदालत ने कहा कि ऐसे पशुओं को अधिकृत गौशालाओं या पशु आश्रयों में विधिवत रसीद के साथ सौंपना मालिक की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख सुझाव

अदालत ने केंद्र और राज्यों के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए—

  • सभी राज्यों में पशु कल्याण संबंधी मौजूदा कानूनों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाए।
  • आवारा पशुओं से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों के लिए वैधानिक मुआवजा व्यवस्था बनाई जाए।
  • सभी मवेशियों के लिए डिजिटल टैगिंग और पहचान प्रणाली अनिवार्य की जाए।
  • पशु छोड़ने वाले मालिकों के लिए अधिकृत आश्रय गृह में पशु जमा करना अनिवार्य हो।
  • प्रत्येक नगर निगम या संबंधित विभाग में नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं, जो टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और पशु आश्रयों की निगरानी करें।

क्या था मामला?

यह मामला 21 सितंबर 2007 की घटना से जुड़ा था, जब विजय कुमार सड़क पर पैदल जा रहे थे और एक आवारा सांड ने उन पर हमला कर दिया। गंभीर सिर की चोट लगने के कारण बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

घटना पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुई थी और प्रशासन से मुआवजे की मांग भी की गई, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद मृतक की पत्नी ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा

हाई कोर्ट की एकल पीठ ने मोटर वाहन अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर लगभग ₹29 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया था।

हालांकि, बाद में खंडपीठ ने यह कहते हुए आदेश रद्द कर दिया कि विवादित तथ्यों का निर्णय रिट याचिका में नहीं किया जा सकता और परिवार को दीवानी मुकदमा दायर करने की सलाह दी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि लगभग दो दशक बाद परिवार को फिर से दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए कहना अन्यायपूर्ण और अनुचित होगा, जिससे उन्हें कोई प्रभावी राहत नहीं मिल पाएगी।

₹15 लाख मुआवजा, लेकिन फैसला मिसाल नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित समय पर पंजाब के नियमों में इस प्रकार की घटनाओं के लिए कोई निश्चित मुआवजा निर्धारित नहीं था। लंबे मुकदमे, मृतक की गंभीर चोटों और मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने ₹15 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले के विशेष तथ्यों के आधार पर दिया गया है और इसे भविष्य के मामलों में बाध्यकारी मिसाल (Precedent) नहीं माना जाएगा।


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