फर्जी नियुक्ति पत्र पर 20 साल तक वेतन मांगता रहा कर्मचारी, पटना हाई कोर्ट ने खारिज की अपील

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पटना हाई कोर्ट ने फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर वेतन और सेवा लाभ मांगने वाले व्यक्ति की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि वैध नियुक्ति के बिना वेतन, पेंशन या सेवा लाभ का कोई अधिकार नहीं बनता और धोखाधड़ी व न्याय साथ-साथ नहीं चल सकते।


फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर वेतन का दावा स्वीकार नहीं, पटना हाई कोर्ट ने खारिज की अपील

पटना हाई कोर्ट ने बिहार शिक्षा विभाग में वर्ष 1998 में चपरासी (Peon) पद पर नियुक्ति का दावा कर वेतन बकाया और अन्य सेवा लाभ मांगने वाले व्यक्ति की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जांच में नियुक्ति पत्र फर्जी पाया गया और यह भी साबित हुआ कि संबंधित व्यक्ति ने कभी सरकारी सेवा जॉइन ही नहीं की तथा उसे कभी वेतन भी नहीं मिला।

मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कोई व्यक्ति वेतन या अन्य सेवा लाभ का दावा नहीं कर सकता।

‘धोखाधड़ी और न्याय साथ-साथ नहीं चल सकते’

हाई कोर्ट ने अपने 8 जुलाई के फैसले में कहा कि इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अपीलकर्ता ने फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Ram Chandra Singh v. Savitri Devi फैसले का हवाला देते हुए कहा कि “धोखाधड़ी और न्याय कभी साथ-साथ नहीं चल सकते।”

कोर्ट ने कहा कि जिस नियुक्ति की नींव ही फर्जी दस्तावेजों पर आधारित हो, उसके आधार पर किसी भी प्रकार का कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं हो सकता।

वेतन और पेंशन वैध नियुक्ति से मिलने वाले वैधानिक अधिकार

पीठ ने स्पष्ट किया कि वेतन, पेंशन और अन्य सेवा लाभ वैधानिक (Statutory) अधिकार हैं, जो केवल वैध और कानूनी नियुक्ति से ही प्राप्त होते हैं। यदि नियुक्ति ही अवैध या फर्जी हो, तो ऐसे किसी भी लाभ का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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क्या था पूरा मामला?

अपीलकर्ता कमलेश कुमार ने दावा किया था कि जून 1998 में भोजपुर-सह-बक्सर के जिला शिक्षा पदाधिकारी ने उन्हें चपरासी के पद पर नियुक्त किया था।

उन्होंने कहा कि नियुक्ति के बाद उन्होंने कार्यभार ग्रहण कर लिया था, लेकिन उन्हें कभी वेतन नहीं दिया गया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2006 में वेतन भुगतान के लिए हाई कोर्ट का रुख किया।

जनवरी 2008 में उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने अपील दायर की, जिसे मई 2008 में भी अदालत ने मूल आदेश में हस्तक्षेप किए बिना निस्तारित कर दिया।

सरकारी जांच में नियुक्ति पत्र निकला फर्जी

हाई कोर्ट ने बताया कि पहले के न्यायिक आदेशों के अनुपालन में राज्य सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव ने स्वयं पूरे मामले की जांच कराई।

जांच में अपीलकर्ता भी शामिल हुआ था और 14 जुलाई 2008 को प्रस्तुत रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि उसका नियुक्ति पत्र “निर्मित (Manufactured) और फर्जी (Forged)” था।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि वह कभी सरकारी सेवा में विधिवत शामिल नहीं हुआ और उसे कभी वेतन का भुगतान नहीं किया गया।

जांच रिपोर्ट को कभी चुनौती नहीं दी

अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता ने जांच में भाग लेने के बावजूद 14 जुलाई 2008 की जांच रिपोर्ट को कभी चुनौती नहीं दी।

कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि उसे जांच रिपोर्ट की प्रति नहीं मिली थी। पीठ ने कहा कि उसे रिपोर्ट की जानकारी थी, लेकिन उसने वर्षों तक कोई कानूनी कदम नहीं उठाया।

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अदालत ने कहा कि ऐसे में यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसे रिपोर्ट की जानकारी नहीं थी।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता आलोक रंजन ने अदालत को बताया कि मामले का पहले ही न्यायिक निर्णय हो चुका था और जांच रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से नियुक्ति पत्र को फर्जी घोषित किया था।

उन्होंने कहा कि चूंकि जांच रिपोर्ट को कभी चुनौती नहीं दी गई, इसलिए उसके निष्कर्ष अंतिम (Final) हो चुके हैं और एकल न्यायाधीश ने वर्ष 2025 में राहत देने से सही इनकार किया था।

हाई कोर्ट का फैसला

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद पटना हाई कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। अदालत ने दोहराया कि फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर वेतन, पेंशन या अन्य सेवा लाभ का कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता और ऐसे मामलों में न्यायालय राहत नहीं दे सकता।


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