पटना हाई कोर्ट ने कहा कि केवल मुंह से शराब की गंध आने के आधार पर किसी पुलिस अधिकारी को शराब पीने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पर्याप्त सबूत न होने पर कोर्ट ने बर्खास्तगी को अवैध मानते हुए बहाली का आदेश बरकरार रखा।
सिर्फ शराब की गंध के आधार पर पुलिस अधिकारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता: पटना हाई कोर्ट
पटना उच्च न्यायालय ने बिहार पुलिस के एक अधिकारी को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केवल मुंह से शराब की गंध आने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यक्ति ने शराब का सेवन किया है। अदालत ने माना कि अधिकारी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी को अवैध घोषित किया गया था।
क्या था पूरा मामला?
संबंधित पुलिस अधिकारी ने बिहार पुलिस में लगभग 32 वर्ष तक सेवा दी थी और वर्ष 2020 में उन्हें सहायक सब-इंस्पेक्टर (ASI) के पद पर पदोन्नत किया गया था। मोतिहारी पुलिस लाइन में तैनाती के दौरान शराब पीने के संदेह में उनके आवास पर छापा मारा गया।
इसके बाद उनके खिलाफ बिहार निषेध एवं उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई और विभागीय कार्रवाई शुरू हुई। जुलाई 2020 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। विभागीय अपील भी खारिज होने के बाद उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
राज्य सरकार की दलील
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है और शराब का सेवन गंभीर अपराध है। सरकार ने तर्क दिया कि बिहार निषेध एवं उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 75(3) के अनुसार ब्रेथ एनालाइजर (सांस विश्लेषक) की रिपोर्ट वैध साक्ष्य है, इसलिए विभाग द्वारा की गई कार्रवाई पूरी तरह उचित थी।
पुलिस अधिकारी का पक्ष
अधिकारी ने अदालत को बताया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप केवल सांस से शराब जैसी गंध आने पर आधारित थे। उनका न तो रक्त परीक्षण कराया गया और न ही मूत्र परीक्षण।
उन्होंने यह भी कहा कि वे तपेदिक (टीबी) का इलाज करा रहे थे और चिकित्सक द्वारा लिखी गई खांसी की दवाइयों का सेवन कर रहे थे, जिनकी वजह से मुंह से गंध आ सकती थी।
हाई कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में पाई गंभीर खामियां
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि जिस चिकित्सक ने ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट तैयार की थी, विभागीय जांच में न तो उसकी गवाही कराई गई और न ही उससे कोई पूछताछ की गई। ऐसे में मेडिकल रिपोर्ट को विधि सम्मत तरीके से साबित ही नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि इस स्थिति में रिपोर्ट को दोष सिद्ध करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
किसी गवाह ने शराब पीते नहीं देखा
अदालत ने यह भी पाया कि विभागीय जांच में जिन गवाहों के बयान दर्ज हुए, उन्होंने केवल शराब जैसी गंध आने की बात कही। किसी भी गवाह ने अधिकारी को शराब पीते हुए नहीं देखा था और न ही उनके कब्जे से कोई शराब बरामद हुई थी।
पीठ ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित थे। ऐसे मामले में दंडात्मक कार्रवाई कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।
सिर्फ ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट पर्याप्त नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही बिहार कानून के तहत ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट को साक्ष्य माना जाता है, लेकिन विभागीय कार्यवाही में उसे विधिक रूप से साबित करना अनिवार्य है। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।
इसके अलावा शराब सेवन की पुष्टि के लिए कोई अन्य निर्णायक वैज्ञानिक जांच, जैसे रक्त या मूत्र परीक्षण, भी नहीं कराया गया।
बर्खास्तगी का आदेश त्रुटिपूर्ण: हाई कोर्ट
अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने अधिकारी की बीमारी और दवाओं से संबंधित बचाव पर उचित विचार नहीं किया। इसलिए बर्खास्तगी का आदेश कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था।
एकल न्यायाधीश के आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और पुलिस अधिकारी की बहाली संबंधी आदेश को बरकरार रखा।
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