सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर कथित भड़काऊ और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाली सामग्री हटाने की मांग वाली PIL पर सुनवाई से इनकार किया। CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता को वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने को कहा।
सोशल मीडिया कंटेंट हटाने की मांग वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कथित तौर पर सांप्रदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय अखंडता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली ऑनलाइन सामग्री की पहचान कर उसे हटाने या ब्लॉक करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ता हितेंद्र कुमार पारसोट्टमभाई गढ़िया की याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार किया। पीठ ने लंबित सोशल मीडिया संबंधी एक अन्य मामले के साथ इस याचिका को जोड़ने से भी इनकार किया।
CJI ने कहा- वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाएं
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी शिकायतों के लिए संबंधित अधिकारियों के समक्ष उपलब्ध वैकल्पिक उपाय अपनाएं। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने याचिकाकर्ता को सोशल मीडिया पर मौजूद ऐसे लोगों या सामग्री को जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं देने की सलाह भी दी।
किन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मांगे गए थे निर्देश?
याचिका में X Corp, YouTube, Facebook, Instagram और WhatsApp सहित प्रमुख सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज के खिलाफ निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने केंद्र के गृह मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया था।
याचिका में मांग की गई थी कि ऐसे सोशल मीडिया पोस्ट को ब्लॉक या हटाने का निर्देश दिया जाए, जिनके बारे में आरोप था कि वे लोगों को सांप्रदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय अखंडता और न्यायिक स्वतंत्रता के खिलाफ भड़का सकते हैं तथा संवैधानिक पदाधिकारियों की संस्थागत प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकते हैं।
IT Act और 2021 के इंटरमीडियरी नियमों का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने Information Technology Act, 2000 तथा Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के तहत अपने दायित्वों का पर्याप्त रूप से पालन नहीं किया है।
याचिका में विशेष रूप से 2021 के नियमों के Rules 3, 3A और 4 के अनुपालन के लिए निर्देश जारी करने की मांग की गई थी।
धार्मिक भावनाओं और सांप्रदायिक तनाव से जुड़ी थीं याचिका की दलीलें
याचिका में आरोप लगाया गया था कि सोशल मीडिया पर वीडियो, मीम्स, एडिट या मैनिपुलेटेड कंटेंट, अपमानजनक पोस्ट और अन्य सामग्री प्रसारित की जा रही है, जो याचिकाकर्ता के अनुसार हिंदू धार्मिक मान्यताओं, सनातन धर्म और हिंदू देवी-देवताओं के प्रति कथित रूप से अपमान, घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देती है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि फर्जी संदेशों और भड़काऊ सामग्री के प्रसार से सार्वजनिक व्यवस्था तथा सांप्रदायिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
‘CJP’ के नाम से भी लगाए गए थे आरोप
याचिका में कथित रूप से ‘Cockroach Janta Party (CJP)’ के बैनर तले सक्रिय भीड़ तथा सोशल मीडिया और SMS के माध्यम से प्रसारित फर्जी संदेशों का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इससे राष्ट्रीय राजधानी और विभिन्न राज्यों की राजधानियों में सुरक्षा संबंधी गंभीर स्थिति उत्पन्न हुई। यह याचिकाकर्ता की ओर से किए गए दावे थे, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में कोई तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज नहीं किया।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर मांगी गई राहत प्रदान नहीं की और याचिकाकर्ता को वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने को कहा। अदालत ने इस याचिका को सोशल मीडिया कंटेंट से संबंधित अन्य लंबित मामले के साथ जोड़ने का अनुरोध भी स्वीकार नहीं किया।
कानूनी महत्व
यह मामला सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक या भड़काऊ सामग्री के खिलाफ कार्रवाई, इंटरमीडियरीज की वैधानिक जिम्मेदारियों और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं से जुड़ा था। हालांकि, बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इन व्यापक कानूनी प्रश्नों पर कोई विस्तृत फैसला नहीं दिया और याचिकाकर्ता को उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का सहारा लेने को कहा।
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