सुप्रीम कोर्ट ने UPPSC 2016 भर्ती परीक्षा मामले में कहा कि अकादमिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित है। हाई कोर्ट दुर्लभ मामलों को छोड़कर उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन नहीं करा सकता।
UPPSC 2016 परीक्षा विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने U.P. Public Service Commission v. Sunil Kumar Singh मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें 2016 की Combined State/Upper Subordinate Services (General Recruitment) Examination और Special Recruitment Examination की उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन और कुछ प्रश्नों को हटाने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि अकादमिक और परीक्षा संबंधी मामलों में अदालतें विशेषज्ञों के निर्णय में तभी हस्तक्षेप कर सकती हैं, जब कोई स्पष्ट और महत्वपूर्ण त्रुटि असाधारण स्थिति में स्थापित हो। अदालत खुद “Expert of Experts” बनकर उत्तरों की दोबारा जांच नहीं कर सकती।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिए थे ये निर्देश
UPPSC की 2016 की दोनों परीक्षाओं के परिणामों को चुनौती दिए जाने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 9 दिसंबर 2016 को आयोग को प्रारंभिक परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं का दोबारा मूल्यांकन करने का निर्देश दिया था।
हाई कोर्ट ने विशेष रूप से—
- प्रश्न संख्या 25, 66 और 92 को हटाकर सभी अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन करने,
- प्रश्न संख्या 44 में विकल्प (b) या (c) चुनने वाले अभ्यर्थियों को पूरे अंक देने,
- पुनर्मूल्यांकन के बाद योग्य होने वाले अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में शामिल करने,
- ऐसे अभ्यर्थियों के लिए नई मुख्य लिखित परीक्षा कराने,
- पहले आयोजित मुख्य परीक्षा के परिणाम को नई प्रक्रिया के अनुसार समायोजित करने और
- दोनों मुख्य परीक्षाओं के परिणामों के आधार पर मेरिट सूची तैयार कर इंटरव्यू कराने
का निर्देश दिया था।
हाई कोर्ट ने प्रश्नपत्र और उत्तर कुंजी में कथित विसंगतियों पर भी टिप्पणी की थी और UPPSC को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के प्रति अधिक सतर्क रहने की सलाह दी थी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या था सवाल?
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि क्या हाई कोर्ट परीक्षा के उत्तरों का पुनर्मूल्यांकन कराने, कुछ प्रश्नों को हटाने, एक प्रश्न के लिए सभी अंक देने और उसके आधार पर दोबारा मुख्य परीक्षा कराने का निर्देश देकर अकादमिक विशेषज्ञों के मूल्यांकन में हस्तक्षेप कर सकता है।
‘अदालत Expert of Experts नहीं बन सकती’
सुप्रीम कोर्ट ने Ran Vijay Singh v. State of U.P. [(2018)] में तय सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि यदि संबंधित कानून, नियम या विनियम उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन या जांच का प्रावधान नहीं करते हैं, तो न्यायिक हस्तक्षेप केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में ही किया जा सकता है।
ऐसे मामले में भी महत्वपूर्ण त्रुटि स्पष्ट रूप से साबित होनी चाहिए। इसके लिए अदालत को अनुमान, तर्क या उत्तरों की अपनी व्याख्या के आधार पर परीक्षा की दोबारा जांच नहीं करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि अदालतों के पास परीक्षा के अकादमिक मूल्यांकन में विशेषज्ञता नहीं होती और ऐसे मामलों को विशेषज्ञों पर छोड़ना चाहिए। सामान्य तौर पर उत्तर कुंजी को सही माना जाना चाहिए और यदि किसी प्रश्न के उत्तर को लेकर वास्तविक संदेह बना रहता है तो उसका लाभ परीक्षा प्राधिकरण को दिया जाना चाहिए, न कि अभ्यर्थी को।
हाई कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा की सीमा पार की
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट ने विवादित प्रश्नों की काफी विस्तार से जांच की और इस तरह परीक्षा विशेषज्ञों की भूमिका में प्रवेश कर गया।
पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा की गई ऐसी विस्तृत जांच के आधार पर जारी निर्देश “clearly indefensible” थे। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट ने अकादमिक क्षेत्र के विशेषज्ञों के निर्णय में हस्तक्षेप करके न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमा पार कर दी।
2016 की परीक्षा, नौ साल बाद बदली परिस्थितियां
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि विवाद 2016 में आयोजित परीक्षाओं से संबंधित था और अपील में सुनवाई के दौरान लगभग नौ साल बीत चुके थे।
7 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपील पर अनुमति दिए जाने के समय ही हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी गई थी। इसलिए हाई कोर्ट के निर्देशों को लागू नहीं किया गया था।
पीठ ने यह भी कहा कि इस बीच नई परीक्षाएं और भर्ती प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी होने की संभावना है। सुनवाई के समय प्रतिवादी भी अदालत के सामने उपस्थित नहीं थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि मामले में आगे हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 9 दिसंबर 2016 के फैसले और आदेश को रद्द कर दिया।
इसके साथ ही UPPSC की सिविल अपील को मंजूर कर लिया गया और लंबित अंतरिम आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गया।
फैसले का महत्व
यह फैसला परीक्षा और भर्ती से जुड़े विवादों में न्यायिक समीक्षा की सीमा को फिर स्पष्ट करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें परीक्षा प्राधिकरण या विषय विशेषज्ञों के स्थान पर बैठकर उत्तरों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकतीं।
जब तक किसी उत्तर कुंजी या मूल्यांकन में स्पष्ट, महत्वपूर्ण और असाधारण त्रुटि सामने न आए, परीक्षा संबंधी निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रहना चाहिए।
फैसला
U.P. Public Service Commission v. Sunil Kumar Singh, Civil Appeal No. 4970 of 2017, निर्णय दिनांक 5 अगस्त 2026
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