नाबालिग का हाथ पकड़ना ‘क्रिमिनल फोर्स’, फिर भी आरोपी बरी—हाई कोर्ट ने बताया क्यों

Like to Share

दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि नाबालिग का हाथ पकड़ना IPC धारा 354 के तहत अपराध है, लेकिन आरोप तय न होने के कारण आरोपी की बरी बरकरार रखी।


हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

Delhi High Court ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि रात में एक अजनबी द्वारा नाबालिग लड़की का हाथ पकड़ना “क्रिमिनल फोर्स” (criminal force) के दायरे में आता है और यह Section 354 IPC के तहत अपराध बन सकता है। हालांकि, अदालत ने तकनीकी कानूनी आधारों पर आरोपी की बरी (acquittal) को बरकरार रखा।


पीठ और अपील का संदर्भ

न्यायमूर्ति Chandrasekharan Sudha की एकल पीठ राज्य द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील Section 378 CrPC के तहत ट्रायल कोर्ट के 2015 के बरी करने वाले फैसले को चुनौती देते हुए दायर की गई थी।


मामले के तथ्य

घटना 20 मार्च 2013 की है, जब 17 वर्षीय नाबालिग लड़की रात करीब 10 बजे कॉमन बाथरूम से अपने कमरे की ओर लौट रही थी। तभी एक अजनबी आरोपी ने पीछे से आकर उसका हाथ पकड़ लिया। लड़की किसी तरह छूटकर अपने कमरे में भागी और दरवाजा बंद कर लिया। आरोपी ने दरवाजा पीटा और गालियां दीं, जिसके बाद आसपास के लोग इकट्ठा हुए और उसे पकड़ लिया।


ट्रायल कोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ Sections 354A and 354D IPC और Section 12 POCSO Act के तहत आरोप तय किए थे। हालांकि, सबूतों के आधार पर इन धाराओं के आवश्यक तत्व साबित न होने पर आरोपी को बरी कर दिया गया।

Must Read -  ‘अधिवक्ता से बदसलूकी मामले को हल्के में नहीं लेंगे’, गौरव भाटिया के साथ हुए बर्ताव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त;

हाई कोर्ट का विश्लेषण: सीमित दायरा

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील में उसका दायरा केवल उन्हीं धाराओं तक सीमित है, जिनके तहत आरोप तय किए गए थे। अदालत ने पाया कि आरोपी का कृत्य न तो यौन उत्पीड़न (Section 354A) और न ही पीछा करना (Section 354D) साबित करता है, और न ही POCSO के तहत गैर-संपर्क यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है।


फिर भी ‘Section 354 IPC’ लागू होता है

अदालत ने विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि आरोपी का कृत्य—रात में अजनबी द्वारा नाबालिग का हाथ पकड़ना—स्पष्ट रूप से “क्रिमिनल फोर्स” है और महिला की गरिमा भंग करने की मंशा दर्शाता है। इस आधार पर यह Section 354 IPC के तहत अपराध बनता है।


फिर सजा क्यों नहीं हुई?

यहां मामला तकनीकी रूप से उलझ गया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने Section 354 IPC के तहत आरोप तय ही नहीं किया था। इसलिए आरोपी को इस धारा में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


Section 222 CrPC भी लागू नहीं

अदालत ने Section 222 CrPC की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल कम सजा होना किसी अपराध को “माइनर ऑफेंस” नहीं बनाता। Section 354 और 354A IPC के तत्व अलग-अलग हैं, इसलिए एक को दूसरे का छोटा रूप नहीं माना जा सकता।


अपील खारिज, बरी बरकरार

इन सभी कारणों से अदालत ने कहा कि भले ही आरोपी का व्यवहार आपराधिक था, लेकिन कानूनी सीमाओं के कारण उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए राज्य की अपील खारिज कर दी गई और बरी का आदेश बरकरार रखा गया।

Must Read -  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से NI Act के तहत अनुसूचित अपराधों के मुकदमों में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतों का विस्तार करने का आग्रह किया

कानूनी सिद्धांत: ‘डबल प्रिजंप्शन ऑफ इनोसेंस’

अदालत ने यह भी दोहराया कि बरी के मामलों में आरोपी के पक्ष में “डबल प्रिजंप्शन ऑफ इनोसेंस” लागू होता है—पहला, मूलभूत निर्दोषता का सिद्धांत, और दूसरा, ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किया जाना।


निष्कर्ष

यह फैसला बताता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में सही आरोप तय करना कितना महत्वपूर्ण है। यदि उचित धाराएं नहीं लगाई जातीं, तो स्पष्ट रूप से आपराधिक कृत्य होने के बावजूद आरोपी को सजा से बचाया जा सकता है।


Tags:
#DelhiHighCourt #CriminalLaw #IPC354 #POCSO #LegalNews #IndiaLaw #Acquittal #JusticeSystem #CourtJudgment #LawExplained

Leave a Comment