‘जींस पहनने से लड़के बिगड़ते हैं’ वाली सोच अस्वीकार्य: दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में बरी करने का फैसला पलटा

Like to Share
  • क्रॉस-एग्जामिनेशन गवाह को अपमानित करने का लाइसेंस नहीं
  • महिला के कपड़े उसकी व्यक्तिगत पसंद हैं
  • कपड़ों या चरित्र के आधार पर गवाही खारिज नहीं की जा सकती

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के कपड़ों पर सवाल उठाना अस्वीकार्य है। कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी की बरी होने की राहत पलटी और क्रॉस-एग्जामिनेशन में महिला की गरिमा बनाए रखने पर जोर दिया।

महिलाओं के कपड़ों को लेकर सोच पर हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला के जींस पहनने से वह युवकों को कथित तौर पर ‘बिगाड़’ सकती है, ऐसी सोच बेहद परेशान करने वाली और अस्वीकार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों को नियंत्रित करना समाधान नहीं है। इसके बजाय बच्चों को अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखने, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करने और हर व्यक्ति के साथ गरिमा से पेश आने की सीख दी जानी चाहिए।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने 10 अगस्त को 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को पलटते हुए उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 354A(1)(i) के तहत दोषी ठहराया।

महिला के कपड़े उसकी व्यक्तिगत पसंद हैं

कोर्ट ने कहा कि कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह पूरी तरह उसकी व्यक्तिगत पसंद का विषय है। न तो पड़ोसियों, न समाज, न आरोपी और न ही अदालत में पेश होने वाले वकील को यह तय करने का अधिकार है कि महिला को किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि पीड़िता से जिरह के दौरान उसके पश्चिमी कपड़े पहनने और जींस-टॉप इस्तेमाल करने को लेकर सवाल किए गए। कोर्ट के अनुसार, ऐसे सवाल उसकी विश्वसनीयता जांचने के बजाय उसे शर्मिंदा करने और परेशान करने की दिशा में थे।

क्रॉस-एग्जामिनेशन गवाह को अपमानित करने का लाइसेंस नहीं

जस्टिस सुधा ने कहा कि जिरह निश्चित रूप से न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी गवाह का अपमान, शर्मिंदगी, डराने या उत्पीड़न करने के लिए नहीं किया जा सकता।

अदालत ने न्यायिक अधिकारियों को भी आगाह किया कि यदि जिरह के दौरान अप्रासंगिक, अशोभनीय, आपत्तिजनक या अपमानजनक सवाल पूछे जाते हैं, तो उन्हें तुरंत रोका जाना चाहिए। खासतौर पर बच्चों, यौन अपराधों के पीड़ितों और अन्य संवेदनशील गवाहों की गरिमा की रक्षा करना अदालत की जिम्मेदारी है।

Must Read -  सुप्रीम कोर्ट ने केरल वक्फ बोर्ड को दी राहत, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में संशोधन कर नीतिगत फैसलों और पूंजीगत व्यय पर लगी रोक हटाई

‘कपड़ों या चरित्र के आधार पर गवाही खारिज नहीं की जा सकती’

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता ऐसे कपड़े पहनती है जिन्हें आरोपी या समाज के कुछ लोग पसंद नहीं करते, तो यह उसकी गवाही को अविश्वसनीय मानने का आधार नहीं हो सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी महिला के चरित्र को उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। महिला की निजी पसंद, जीवनशैली या कथित चरित्र चाहे जैसा भी बताया जाए, उसे अपनी निजता और शारीरिक गरिमा की रक्षा करने तथा कानून का संरक्षण पाने का पूरा अधिकार है।

2013 की घटना में यौन उत्पीड़न का आरोप

मामला 17 जुलाई 2013 की घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी उसका पीछा करता था, अश्लील और यौन प्रकृति की टिप्पणियां करता था तथा उसके गाल और कूल्हे को छूता था।

ट्रायल कोर्ट ने 22 अगस्त 2014 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 354A और POCSO Act की धारा 10 के तहत आरोपों से बरी कर दिया था। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

गाल छूने और टिप्पणियों से धारा 354A का अपराध बना

हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता के बयान में कुछ अंतर जरूर थे, लेकिन उसके गाल छूने संबंधी आरोप लगातार कायम रहा। आरोपी की कथित टिप्पणियों के साथ इस आरोप को देखते हुए अदालत ने माना कि भारतीय दंड संहिता की धारा 354A(1)(i) के तहत अपराध बनता है।

इस आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को इस हिस्से में पलट दिया और आरोपी को यौन उत्पीड़न के अपराध में दोषी ठहराया।

POCSO के तहत आरोप साबित नहीं हुआ

हालांकि, हाई कोर्ट ने POCSO Act के तहत आरोप को बरकरार नहीं रखा। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष शिकायतकर्ता की नाबालिग उम्र को पर्याप्त रूप से साबित करने में असफल रहा।

जन्म पंजीकरण में देरी, संबंधित रजिस्टर में आवश्यक प्रविष्टि का अभाव और अपेक्षित एसडीएम आदेश से जुड़ी कमियों के कारण अदालत ने माना कि POCSO के प्रावधान लागू करने के लिए उम्र का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं था।

Must Read -  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 वर्षीय बेटे की कस्टडी पिता को सौंपी, कहा- बच्चे की इच्छा और कल्याण सर्वोपरि

‘अदालत पीड़ित के लिए दूसरी पीड़ा की जगह न बने’

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य पीड़ित या गवाह को और अधिक मानसिक आघात देना नहीं हो सकता। न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अदालत की कार्यवाही किसी पीड़ित के लिए ‘दूसरी पीड़ा’ का कारण न बने।

अदालत ने कहा कि महिला के कपड़ों, चरित्र, जीवनशैली, धर्म या व्यक्तिगत पसंद से जुड़े सवाल तभी पूछे जाने चाहिए जब उनका मामले से वास्तविक और आवश्यक संबंध हो

आरोपी को सजा पर सुनवाई के लिए पेश होने का निर्देश

हाई कोर्ट ने आरोपी को 12 अगस्त को सजा के मुद्दे पर सुनवाई के लिए अदालत के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया है। इस तरह अदालत ने यौन उत्पीड़न के आरोप में आरोपी की बरी होने की राहत को पलट दिया, जबकि पर्याप्त उम्र प्रमाण के अभाव में POCSO के तहत आरोप को कायम नहीं रखा।

फोकस: इस फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला के कपड़े, चरित्र या व्यक्तिगत पसंद को उसके खिलाफ इस्तेमाल करके उसकी गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता और क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान उसकी गरिमा की रक्षा करना न्यायालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

Tags:
#दिल्लीहाईकोर्ट #यौनउत्पीड़न #महिलाअधिकार #महिलाकीगरिमा #क्रॉसएग्जामिनेशन #POCSO #SexualHarassment #DelhiHighCourt #WomensRights #CrossExamination #POCSOAct

Leave a Comment