राजस्थान हाईकोर्ट रजिस्ट्री से ‘गायब’ केस रिकॉर्ड पर सवाल, जस्टिस संदीप मेहता के आरोपों से जोड़ना अभी जल्दबाजी

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दोनों मामलों के बीच किसी संबंध का कोई न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट में कारोबारी ज्ञान चंद अग्रवाल की क्वैशिंग याचिकाओं से जुड़े रिकॉर्ड ट्रेस न होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने रिकॉर्ड तलाशने के लिए रजिस्ट्रार जनरल से संपर्क की छूट दी, जबकि जस्टिस संदीप मेहता के प्रशासनिक आरोप अलग मुद्दा हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट की रजिस्ट्री की क्रिमिनल ब्रांच से कारोबारी ज्ञान चंद अग्रवाल और दो अन्य आरोपियों की क्वैशिंग याचिकाओं से जुड़े रिकॉर्ड ट्रेस न होने के मामले ने न्यायिक रिकॉर्ड के रखरखाव और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि यह घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता द्वारा राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासन को लेकर लगाए गए अलग-अलग आरोपों के बीच सामने आया है, लेकिन दोनों मामलों के बीच किसी संबंध का कोई न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष अनुमति याचिका (SLP) के अनुसार, संबंधित रिकॉर्ड 10 अप्रैल 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट की क्रिमिनल ब्रांच में ट्रेस नहीं हो पाए थे। इसके बाद हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) से मामले में विस्तृत रिपोर्ट मांगी। याचिका के मुताबिक, रजिस्ट्री ने रिपोर्ट पेश की, लेकिन हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल 2026 को उसे अपर्याप्त माना।

सुप्रीम कोर्ट ने 10 अगस्त को SLP खारिज की

मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 10 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए SLP खारिज कर दी।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट में क्वैशिंग याचिका की जल्द सुनवाई के लिए अनुरोध करने की स्वतंत्रता दी। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि यदि संबंधित रिकॉर्ड रजिस्ट्री में ट्रेस नहीं हो रहे हैं तो याचिकाकर्ता रजिस्ट्रार जनरल से संपर्क कर सकता है, ताकि दस्तावेजों को तलाशकर हाईकोर्ट के समक्ष रखने के लिए आवश्यक प्रयास किए जा सकें।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने न तो रिकॉर्ड गायब होने के पीछे किसी साजिश का निष्कर्ष निकाला और न ही मामले के आरोपों के गुण-दोष पर कोई फैसला दिया।

मामला क्या है?

मूल आपराधिक मामला राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) द्वारा वर्ष 2023 में दर्ज FIR से संबंधित है। इसमें धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप शामिल हैं।

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SLP में यह भी दावा किया गया कि राजस्थान पुलिस ने अग्रवाल के खिलाफ दर्ज करीब 298 मामलों का सत्यापन किया था। याचिका में प्रवर्तन निदेशालय की एक प्रेस रिलीज का भी हवाला दिया गया, जिसके अनुसार जयपुर में अग्रवाल के खिलाफ 300 से अधिक FIR दर्ज होने और उन्हें राजस्थान पुलिस द्वारा हिस्ट्रीशीटर घोषित किए जाने की बात कही गई थी।

हालांकि ये विवरण संबंधित पक्ष द्वारा अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री का हिस्सा हैं और इन्हें स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं माना जा सकता।

रिकॉर्ड न मिलना अपने आप में ‘गड़बड़ी’ का सबूत नहीं

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी न्यायिक रिकॉर्ड का ट्रेस न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसे जानबूझकर हटाया गया, नष्ट किया गया या किसी अनुचित उद्देश्य से गायब किया गया।

इसी तरह, सुप्रीम कोर्ट के 10 अगस्त के आदेश में ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं है जिससे यह स्थापित हो कि अग्रवाल की केस फाइल के रिकॉर्ड और राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासन को लेकर लगाए गए अलग आरोपों के बीच कोई संबंध है।

जस्टिस संदीप मेहता के आरोप अलग मुद्दा

यह घटनाक्रम इसलिए अधिक चर्चा में आया क्योंकि इसी अवधि में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासन को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को तीन पत्र लिखे थे।

इन पत्रों में कथित तौर पर कुप्रशासन, रोस्टर आवंटन, भाई-भतीजावाद और पक्षपात जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। जस्टिस मेहता ने कुछ मामलों को राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष रखे जाने तथा कुछ वकीलों और मुकदमों को कथित प्राथमिकता दिए जाने पर भी सवाल उठाए थे।

हालांकि इन आरोपों की अभी तक किसी सक्षम संस्थागत प्रक्रिया में पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य या न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

CJI कार्यालय ने भी स्पष्ट किया है कि किसी मौजूदा जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर स्थापित संस्थागत प्रक्रिया के तहत ही विचार किया जाना चाहिए और केवल आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता।

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न्यायिक रिकॉर्ड के संरक्षण पर बड़ा सवाल

अग्रवाल मामले में रिकॉर्ड के ट्रेस न होने की घटना का व्यापक महत्व इस बात में है कि क्वैशिंग याचिकाओं, आपराधिक मामलों और गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण जैसे मामलों में न्यायिक रिकॉर्ड की उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है।

ऐसे मामलों में केस फाइल के किसी हिस्से का उपलब्ध न होना सुनवाई की गति और न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसलिए रिकॉर्ड की डिजिटल और भौतिक ट्रैकिंग, सुरक्षित संरक्षण तथा समय पर उपलब्धता न्यायिक प्रशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले को उसके मूल स्तर पर ही रहने दिया है। राजस्थान हाईकोर्ट में कार्यवाही जारी रहेगी, जबकि रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के लिए रजिस्ट्रार जनरल से संपर्क का रास्ता खुला रखा गया है।

इसलिए वर्तमान स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि रिकॉर्ड का ट्रेस न होना एक प्रशासनिक चिंता जरूर है, लेकिन इसे जानबूझकर की गई गड़बड़ी या जस्टिस संदीप मेहता के अलग आरोपों से जोड़ने का कोई स्थापित आधार अभी मौजूद नहीं है।

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