NEET पेपर लीक छात्र आंदोलन: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच के दिए संकेत, नाबालिग छात्रों की रिहाई का आदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने NEET 2026 पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र आंदोलनों के दौरान हिंसा और पुलिस कार्रवाई के आरोपों पर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की जरूरत बताई। अदालत ने सात राज्यों को नोटिस जारी करते हुए नाबालिग छात्र प्रदर्शनकारियों की रिहाई और छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक के अंतरिम निर्देश दिए।


छात्र आंदोलन में हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने NEET 2026 पेपर लीक के विरोध में देशभर में हुए छात्र आंदोलनों के दौरान हिंसा और पुलिस कार्रवाई के आरोपों को गंभीर मानते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की आवश्यकता प्रतीत होती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया।


किन राज्यों को भेजा गया नोटिस?

सुप्रीम कोर्ट ने निम्न राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया—

  • महाराष्ट्र
  • बिहार
  • असम
  • उत्तर प्रदेश
  • मध्य प्रदेश
  • पश्चिम बंगाल
  • केरल

अदालत ने निर्देश दिया कि इन राज्यों के महाधिवक्ता (Advocate General) या अधिकृत विधि अधिकारी अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हों।


CCTV, ड्रोन और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश

अंतरिम आदेश के तहत सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित राज्यों और अधिकारियों को निर्देश दिया कि छात्र आंदोलनों से जुड़े सभी महत्वपूर्ण डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं।

इनमें शामिल हैं—

  • CCTV फुटेज
  • ड्रोन रिकॉर्डिंग
  • बॉडी-वॉर्न कैमरा फुटेज
  • वीडियो रिकॉर्डिंग
  • वायरलेस संचार रिकॉर्ड
  • PCR लॉग और अन्य रिकॉर्ड

अदालत ने कहा कि ये सभी साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं ताकि भविष्य की जांच निष्पक्ष रूप से की जा सके।


छात्रों का व्यक्तिगत डेटा सार्वजनिक नहीं होगा

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों से संबंधित एकत्रित व्यक्तिगत जानकारी और डिजिटल डेटा सुरक्षित रखा जाए, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया जाए।

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साथ ही अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि छात्र प्रदर्शनकारियों की पहचान या व्यक्तिगत विवरण मीडिया अथवा सार्वजनिक मंचों पर प्रकाशित न किए जाएं।


छात्रों के खिलाफ फिलहाल नहीं होगी जबरन कार्रवाई

अदालत ने स्पष्ट किया कि दर्ज एफआईआर की जांच जारी रह सकती है, लेकिन सुनवाई पूरी होने तक छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।

हालांकि यह राहत उन लोगों को नहीं मिलेगी जिनका आपराधिक रिकॉर्ड (Criminal Antecedents) है।


नाबालिग छात्रों की तत्काल रिहाई का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि आंदोलन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम आयु के सभी छात्रों, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।

अदालत ने कहा कि आवश्यकता होने पर ऐसे बच्चों को स्वयं या उनके परिवार द्वारा साधारण बांड (Simple Bond) भरने पर रिहा किया जा सकता है।


याचिकाकर्ताओं ने पुलिस पर क्या आरोप लगाए?

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि दिल्ली सहित कई राज्यों में पुलिस ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किया।

याचिका में आरोप लगाए गए कि—

  • लाठीचार्ज किया गया,
  • रबर बुलेट और पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ,
  • आंसू गैस छोड़ी गई,
  • इलेक्ट्रॉनिक बैटन का प्रयोग किया गया,
  • कीलों वाली लाठियों (Nail-Embedded Lathis) से हमला किया गया।

याचिका के अनुसार इन घटनाओं में कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए, एक छात्र की कथित रूप से आंख की रोशनी चली गई, एक महिला घायल हुई और मीडिया कर्मियों के साथ भी मारपीट की गई।


सरकार और पुलिस का पक्ष

केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच पर कोई आपत्ति नहीं है।

हालांकि उन्होंने पुलिस अत्याचार के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि आंदोलन में कुछ असामाजिक और आपराधिक तत्व भी शामिल हो गए थे, जिन्होंने पुलिस पर पथराव और हिंसक हमले किए, जिससे 280 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए।

पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की ओर से भी अदालत के समक्ष तस्वीरें, वीडियो और अन्य सामग्री प्रस्तुत की गई।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छात्रों द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया स्वतंत्र जांच की मांग करते हैं।

साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच केवल छात्रों द्वारा लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि घायल पुलिसकर्मियों के आरोपों और घटनाओं की भी समान रूप से निष्पक्ष जांच की जाएगी।

अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और संबंधित राज्यों को हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया।


अगली सुनवाई कब होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को निर्धारित की है।


फैसले का महत्व

यह अंतरिम आदेश शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है, वहीं यदि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी भी हिंसा का शिकार हुए हैं तो उन आरोपों की भी समान गंभीरता से जांच की जानी चाहिए। साथ ही अदालत ने छात्रों की निजता, नाबालिगों के अधिकार और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण अंतरिम सुरक्षा उपाय लागू किए हैं।


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