भोजशाला कमाल मौला मस्जिद सुप्रीम कोर्ट: शुक्रवार की नमाज के लिए अलग खुली जगह उपलब्ध कराने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले पर तत्काल रोक लगाने और 2003 की व्यवस्था बहाल करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार, ASI और हिंदू पक्ष को नोटिस जारी करते हुए मुस्लिम समुदाय को अंतरिम राहत के रूप में शुक्रवार की नमाज के लिए अलग खुली जगह उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर से जुड़े विवाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले के क्रियान्वयन पर रोक लगाने और वर्ष 2003 की पूर्व व्यवस्था (Status Quo Ante) बहाल करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मुस्लिम पक्ष की अपीलों पर केंद्रित सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और हिंदू पक्ष से जवाब तलब किया।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने मामले को दो से तीन सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
मुस्लिम पक्ष को अंतरिम राहत, शुक्रवार की नमाज के लिए अलग स्थान
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तहत निर्देश दिया कि विवादित परिसर से सटे एक अलग खुले स्थान पर मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज अदा करने की अनुमति दी जाए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम (Ad Hoc) होगी और इससे किसी भी पक्ष के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। अंतिम निर्णय अपीलों के निस्तारण के बाद ही होगा।
ASI को संरचनात्मक बदलाव से रोका
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को निर्देश दिया कि वह न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना विवादित परिसर में कोई भी संरचनात्मक परिवर्तन (Structural Alteration) नहीं करेगा।
अदालत ने कहा कि परिसर में किसी प्रकार का निर्माण या संरचनात्मक बदलाव केवल न्यायालय की अनुमति के बाद ही किया जा सकेगा।
2003 की व्यवस्था बहाल करने की मांग
मुतवल्लियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी तथा अन्य मुस्लिम अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और वृंदा ग्रोवर ने अदालत से वर्ष 2003 की व्यवस्था बहाल करने का अनुरोध किया।
उस व्यवस्था के तहत मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज अदा करने की अनुमति थी, जबकि हिंदू पक्ष मंगलवार तथा वसंत पंचमी के अवसर पर पूजा-अर्चना करता था।
हाई कोर्ट के फैसले पर जताई आपत्ति
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 15 मई को फैसला सुरक्षित रखने के मात्र दो दिन बाद ही निर्णय सुना दिया, जिससे मुस्लिम पक्ष को सुप्रीम कोर्ट का रुख करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल सका।
उन्होंने कहा कि लगभग 23 वर्षों से लागू व्यवस्था को बिना कोई अंतराल दिए बदल दिया गया।
सिंघवी ने यह भी कहा कि यह विवाद केवल धार्मिक अधिकारों का नहीं, बल्कि संविधान की प्रस्तावना में निहित धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और बंधुत्व (Fraternity) जैसे मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यथास्थिति बदलने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम स्तर पर 2003 की व्यवस्था बहाल करने से इनकार करते हुए कहा कि धार्मिक रूप से संवेदनशील मामलों में अंतरिम आदेश पारित करते समय अदालत को उसके व्यापक प्रभावों को ध्यान में रखना पड़ता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि अदालत को ऐसे मामलों में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए ताकि किसी नए विवाद या तनाव की स्थिति उत्पन्न न हो।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो मामले की दिन-प्रतिदिन (Day-to-Day) सुनवाई भी की जा सकती है।
कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी हुई चर्चा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2003 की व्यवस्था लागू रहने के दौरान भी परिसर में कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दोनों पक्षों को धैर्य रखना चाहिए और अदालत अंतिम सुनवाई के दौरान सभी मुद्दों पर विस्तार से विचार करेगी।
राज्य सरकार ने किया विरोध
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2003 की व्यवस्था बहाल करने की मांग का विरोध किया।
उन्होंने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट के फैसले के बाद लगभग दो महीने बीत चुके हैं और प्रशासन की सक्रियता के कारण वर्तमान में क्षेत्र में शांति और सामान्य स्थिति बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि अब जबकि अंतिम सुनवाई शीघ्र होने वाली है, तब तक वर्तमान व्यवस्था बनाए रखना ही उचित होगा।
मुस्लिम पक्ष ने सदियों पुरानी परंपरा का दिया हवाला
वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने अदालत को बताया कि मुस्लिम समुदाय सदियों से इस स्थल पर नमाज अदा करता रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1997 में तत्कालीन कलेक्टर द्वारा विकसित व्यवस्था और वर्ष 2003 में ASI द्वारा औपचारिक रूप से लागू व्यवस्था दोनों समुदायों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Coexistence) का उदाहरण थीं।
अहमदी के अनुसार, हाई कोर्ट के फैसले और उसके बाद ASI के आदेश से लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था समाप्त हो गई और हिंदू पक्ष को व्यापक पूजा-अधिकार मिल गए।
वृंदा ग्रोवर ने भी फैसले पर उठाए सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने दलील दी कि संबंधित मस्जिद का इतिहास 12वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है और लंबे समय से चली आ रही धार्मिक व्यवस्था को समाप्त करने का कोई औचित्य नहीं है।
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के निर्णय से मुस्लिम समुदाय को अपूरणीय क्षति (Irreparable Prejudice) हुई है।
हाई कोर्ट के फैसले को दी गई है चुनौती
मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के 15 मई के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में विवादित स्मारक का धार्मिक स्वरूप मां सरस्वती को समर्पित भोजशाला मंदिर का माना था। साथ ही वर्ष 2003 की ASI व्यवस्था को उस सीमा तक निरस्त कर दिया था, जहां वह हिंदू पक्ष के पूजा-अधिकारों को सीमित करती थी तथा शुक्रवार की नमाज की व्यवस्था बनाए रखती थी।
हाई कोर्ट ने केंद्र और ASI को दिए थे निर्देश
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और ASI को भोजशाला परिसर के प्रशासन एवं प्रबंधन के संबंध में आवश्यक निर्णय लेने का निर्देश दिया था, जबकि संरक्षित स्मारक के संरक्षण और नियमन का अधिकार ASI के पास ही बनाए रखा था।
इसके अतिरिक्त हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से लंदन के संग्रहालय में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला परिसर में पुनर्स्थापित करने संबंधी अभ्यावेदनों पर विचार करने की बात कही थी।
साथ ही यह भी कहा था कि यदि मुस्लिम समुदाय धार जिले में मस्जिद या नमाज स्थल के लिए उपयुक्त भूमि आवंटन का अनुरोध करता है, तो राज्य सरकार कानून के अनुसार उस पर विचार कर सकती है।
Tags
#SupremeCourt #Bhojshala #KamalMaulaMosque #Dhar #MadhyaPradesh #CJISuryaKant #ASI #ReligiousDispute #AbhishekManuSinghvi #TusharMehta #LegalNews #HindiLegalNews #सुप्रीमकोर्ट #भोजशाला #कमालमौलामस्जिद #धार #मध्यप्रदेश #एएसआई #कानूनीसमाचार
