सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: ‘घरदामाद’ बनाने की प्रथा साबित किए बिना नहीं मिलेगा पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार

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उरांव जनजाति उत्तराधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उरांव जनजाति की प्रथागत विधि के तहत केवल कथित प्रथा के आधार पर उत्तराधिकार का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रथा (Custom) को लागू कराने से पहले उसके अस्तित्व, प्राचीनता और निरंतर पालन का ठोस प्रमाण देना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने उरांव (Oraon) जनजाति की प्रथागत उत्तराधिकार व्यवस्था (Customary Succession) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि सिर्फ कथित प्रथा (Custom) का दावा करने भर से उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। जिस पक्ष ने किसी प्रथा के आधार पर अधिकार का दावा किया है, उसी पर यह साबित करने का दायित्व है कि वह प्रथा वास्तव में अस्तित्व में है, प्राचीन है, निश्चित है और लंबे समय से लगातार पालन की जाती रही है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की खंडपीठ ने कहा कि उरांव समुदाय की मान्य प्रथागत विधि के तहत कोई चाचा-ससुर (Uncle-in-law) अपनी भांजी के पति को ‘घरदामाद’ बनाकर उसे पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बना सकता। अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट सहित निचली अदालतों के फैसलों को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली।

क्या था पूरा मामला?

विवाद उरांव जनजाति की प्रथागत उत्तराधिकार व्यवस्था के तहत पैतृक संपत्ति के अधिकार को लेकर था।

अपीलकर्ता का दावा था कि अंतिम पुरुष उत्तराधिकारी की मृत्यु के बाद वह परिवार का सबसे निकटतम पुरुष अग्नेट (Male Agnate) होने के कारण संपत्ति का वैध उत्तराधिकारी है। उसका कहना था कि संबंधित प्रथा के अनुसार बेटियों को पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त नहीं था।

वहीं प्रतिवादियों का दावा था कि मृतक भूमिधर की कोई संतान नहीं थी। इसलिए उसने अपनी भांजी के पति को ‘घरदामाद’ के रूप में स्वीकार किया था, जिसके आधार पर उसे संपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त हो गया। प्रतिवादियों ने अपने पक्ष में एक कथित बंटवारा/पट्टा (Partition/Lease Deed) का भी सहारा लिया।

निचली अदालतों ने प्रतिवादियों के पक्ष में दिया था फैसला

ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता का दावा खारिज करते हुए माना कि संबंधित ‘घरदामाद’ को संपत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त हो गया था।

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इसके बाद प्रथम अपीलीय न्यायालय और झारखंड हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इन आदेशों को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

प्रथागत कानून साबित करना दावा करने वाले की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रथागत कानून (Customary Law) का लाभ लेने वाले पक्ष पर यह साबित करने का दायित्व होता है कि वह प्रथा—

  • वास्तव में अस्तित्व में है,
  • प्राचीन (Ancient) है,
  • निश्चित (Certain) है,
  • तर्कसंगत (Reasonable) है, तथा
  • लंबे समय से लगातार पालन की जाती रही है।

अदालत ने कहा कि केवल याचिका में किसी प्रथा का उल्लेख कर देने से उसे स्वतः मान्यता नहीं मिल जाती। ऐसी प्रथा को विश्वसनीय साक्ष्यों, सार्वजनिक अभिलेखों अथवा उस प्रथा से परिचित व्यक्तियों की सुसंगत गवाही के माध्यम से सिद्ध करना आवश्यक होता है।

‘घरदामाद’ की मान्य प्रथा का दायरा सीमित

रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उरांव समुदाय में ऐसी प्रथा अवश्य मौजूद है, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपने दामाद (घरदामाद) को अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी बना सकता है।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह सिद्ध हो सके कि कोई चाचा-ससुर अपनी भांजी के पति को ‘घरदामाद’ बनाकर उसे उत्तराधिकार का अधिकार प्रदान कर सकता है।

पीठ ने कहा कि निचली अदालतों ने प्रथागत कानून की गलत व्याख्या करते हुए इस कथित प्रथा को स्वीकार कर लिया, जबकि मान्य प्रथा केवल भूमि स्वामी अथवा उसकी विधवा द्वारा घरदामाद स्वीकार किए जाने तक सीमित थी।

कथित बंटवारा या पट्टा दस्तावेज से भी नहीं मिला स्वामित्व

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों द्वारा पेश किए गए दस्तावेज की भी जांच की।

अदालत ने कहा कि यदि वह दस्तावेज पट्टा (Lease Deed) था, तो उससे स्वामित्व अधिकार उत्पन्न नहीं हो सकते। वहीं यदि उसे बंटवारा (Partition Deed) माना जाए, तब भी उसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं होगा, क्योंकि बंटवारा केवल उन व्यक्तियों के बीच हो सकता है जिनका संपत्ति में पहले से हिस्सा हो।

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ऐसी स्थिति में उक्त दस्तावेज प्रतिवादियों के स्वामित्व के दावे को मजबूत नहीं करता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत वह तथ्यों पर आधारित समवर्ती निष्कर्षों (Concurrent Findings) में हस्तक्षेप नहीं करता।

लेकिन यदि ऐसे निष्कर्ष कानून की गलत व्याख्या, अपर्याप्त साक्ष्य या स्पष्ट त्रुटि (Perverse Findings) पर आधारित हों, तो सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।

पीठ ने पाया कि वर्तमान मामले में निचली अदालतों के सभी निष्कर्ष एक ऐसी प्रथा पर आधारित थे, जिसे प्रतिवादी सिद्ध ही नहीं कर सके थे।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे कि उरांव समुदाय में ऐसी कोई मान्य प्रथा है जिसके तहत चाचा-ससुर अपनी भांजी के पति को ‘घरदामाद’ बनाकर पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी बना सकता है।

अदालत ने माना कि मान्य प्रथागत कानून के अनुसार, वैध ‘घरदामाद’ या अन्य पात्र पुरुष उत्तराधिकारी के अभाव में संपत्ति निकटतम पुरुष अग्नेट (Nearest Male Agnate) को प्राप्त होगी।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय न्यायालय तथा झारखंड हाई कोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में डिक्री पारित कर दी।

मामला: Bejla Oraon v. Kali Das Oraon, Civil Appeal No. 8780 of 2026
निर्णय की तिथि: 9 जुलाई 2026


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