बालिग बेटी को घर लौटने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा- शादी, शिक्षा और रहने का फैसला उसका मौलिक अधिकार

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बालिग महिला के अधिकार पर बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि 21 वर्षीय बालिग महिला को उसके माता-पिता या राज्य उसकी इच्छा के विरुद्ध घर लौटने, शादी करने या शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि ये सभी निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा हैं।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि 21 वर्षीय बालिग महिला को यह तय करने का पूरा कानूनी अधिकार है कि वह कहां रहेगी, किससे विवाह करेगी और अपनी पढ़ाई जारी रखेगी या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता या राज्य किसी भी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध घर लौटने या शादी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखाड की खंडपीठ ने कहा कि व्यक्तिगत जीवन से जुड़े ऐसे निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता 21 वर्षीय युवती है, जिसने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की थी और हैदराबाद में अपने माता-पिता के साथ रह रही थी।

15 जून 2026 को वह स्वेच्छा से अपना घर छोड़कर चली गई। उसका कहना था कि उसके माता-पिता उसकी शादी उसके चचेरे भाई से कराना चाहते थे, जो उससे लगभग 10 वर्ष बड़ा था। वह इस विवाह के लिए तैयार नहीं थी और आगे उच्च शिक्षा प्राप्त कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती थी।

युवती ने अदालत को बताया कि उसका परिवार अत्यधिक रूढ़िवादी विचारों वाला है, जहां उसे अपनी इच्छाएं और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं थी तथा उसे मानसिक और भावनात्मक दबाव का सामना करना पड़ता था।

घर छोड़ने के बाद दर्ज हुई गुमशुदगी की रिपोर्ट

युवती के घर छोड़ने के बाद उसके माता-पिता ने हैदराबाद पुलिस में गुमशुदगी (Missing Person) की रिपोर्ट दर्ज करा दी।

युवती को आशंका थी कि परिवार के लोग उसे जबरन वापस ले जाकर उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी करवा सकते हैं। इसी आशंका के चलते उसने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सुरक्षा और किसी भी प्रकार की जबरदस्ती से संरक्षण की मांग की।

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माता-पिता ने अदालत को दिया आश्वासन

सुनवाई के दौरान युवती के माता-पिता की ओर से अदालत को आश्वासन दिया गया कि वे उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह करने के लिए बाध्य नहीं करेंगे और उसकी शिक्षा में भी कोई बाधा नहीं डालेंगे।

राज्य सरकार ने भी कार्यवाही में भाग लिया, हालांकि उसने किसी प्रकार की जबरन कार्रवाई का समर्थन नहीं किया।

अदालत ने अलग-अलग की दोनों पक्षों से बातचीत

हाई कोर्ट ने पहले युवती और उसके माता-पिता से अलग-अलग बातचीत की और बाद में उन्हें आपस में बातचीत का अवसर भी दिया।

माता-पिता द्वारा बार-बार अनुरोध और आश्वासन दिए जाने के बावजूद युवती ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह फिलहाल अपने घर वापस नहीं जाना चाहती।

हालांकि उसने अपने माता-पिता को भरोसा दिलाया कि वह नियमित रूप से उनसे संपर्क बनाए रखेगी, वे उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित न हों और उसका पीछा (Tracking) करने का प्रयास न करें।

बालिग होने के कारण अपने फैसले स्वयं लेने का अधिकार

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने अपनी इच्छा से घर छोड़ा है और वह पूरी तरह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले रही है।

पीठ ने कहा कि 21 वर्ष की आयु होने के कारण वह एक बालिग नागरिक है और कानूनन यह निर्णय लेने के लिए सक्षम है कि—

  • वह कहां निवास करेगी,
  • विवाह करना चाहती है या नहीं,
  • तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती है या नहीं।

अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित हैं व्यक्तिगत निर्णय

हाई कोर्ट ने कहा कि निवास, विवाह और शिक्षा जैसे निर्णय पूरी तरह व्यक्तिगत पसंद (Personal Choice) के विषय हैं और ये संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता द्वारा दिए गए आश्वासन स्वागत योग्य हैं, लेकिन वे याचिकाकर्ता की स्वतंत्र इच्छा और उसके संवैधानिक अधिकारों का स्थान नहीं ले सकते।

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गुमशुदगी का मामला बंद करने का निर्देश

अदालत ने कहा कि जब स्वयं न्यायालय ने याचिकाकर्ता से बातचीत कर यह संतुष्टि प्राप्त कर ली है कि वह अपनी इच्छा से घर छोड़कर गई है, तब उसे गुमशुदा व्यक्ति मानने या उसे वापस लाने के लिए किसी प्रकार की जबरदस्ती का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

इसी आधार पर अदालत ने तेलंगाना पुलिस को कानून के अनुसार युवती के संबंध में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट बंद करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।

साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसके पैतृक घर लौटने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा और न ही उसके विरुद्ध किसी आपराधिक कार्यवाही की धमकी देकर दबाव बनाया जाएगा।

हाई कोर्ट का फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को आवश्यक संरक्षण प्रदान किया और कहा कि एक बालिग महिला को उसके जीवन, शिक्षा, निवास और विवाह से जुड़े निर्णय स्वयं लेने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।

मामला: Safia Sultana v. State of Maharashtra
मामला संख्या: Criminal Writ Petition No. 3151 of 2026
निर्णय की तिथि: 2 जुलाई 2026


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