सुप्रीम कोर्ट: केवल कथित लापरवाही के आधार पर वकील का नाम IBA Caution List में नहीं डाला जा सकता

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बैंक ने पैनल से हटाया, फिर IBA Caution List में डलवाया नाम, BCI को अनुशासनिक व्यवस्था का ऑडिट करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल कथित पेशेवर लापरवाही या गलत कानूनी राय के आधार पर किसी अधिवक्ता का नाम Indian Banks’ Association (IBA) की Caution List में शामिल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने BCI को अनुशासनिक व्यवस्था का प्रदर्शन ऑडिट (Performance Audit) करने और Continuing Legal Education (CLE) व्यवस्था मजबूत करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अधिवक्ता को केवल कथित पेशेवर लापरवाही (Professional Negligence) या गलत कानूनी राय (Erroneous Legal Opinion) देने के आरोप में Indian Banks’ Association (IBA) की Caution List में शामिल नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी बैंक को किसी पैनल अधिवक्ता के आचरण पर आपत्ति है, तो वह उसे अपने पैनल से हटा सकता है, लेकिन उसकी पेशेवर क्षमता या कदाचार की सार्वजनिक घोषणा करने का अधिकार उसे नहीं है।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि IBA की Caution List का प्रभाव केवल निजी अनुबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अधिवक्ता के पेशे का अभ्यास करने के अधिकार पर प्रत्यक्ष असर डालता है। इसलिए इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका सुनवाई योग्य (Maintainable) थी।

क्या था मामला?

अपीलकर्ता वर्ष 1998 से अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हैं और वर्ष 2010 से कैनरा बैंक सहित कई बैंकों के पैनल अधिवक्ता रहे थे।

वर्ष 2015 में उन्होंने ₹2 करोड़ के ऋण के लिए गिरवी रखी गई संपत्ति के संबंध में कानूनी राय दी थी। बाद में बैंक ने आरोप लगाया कि संपत्ति का एक हिस्सा वर्ष 2012 में ही बेचा जा चुका था, लेकिन अधिवक्ता ने अपनी राय में इसका उल्लेख नहीं किया, जिससे बैंक वित्तीय जोखिम में आ गया।

बैंक ने पैनल से हटाया, फिर IBA Caution List में डलवाया नाम

अधिवक्ता के स्पष्टीकरण के बावजूद कैनरा बैंक ने 31 जनवरी 2019 को उन्हें अपने पैनल से हटा दिया।

इसके बाद बैंक ने उनका नाम Indian Banks’ Association को भेज दिया, जिसने 5 फरवरी 2020 से उन्हें “Third Party Entities Involved in Fraud” शीर्षक वाली Caution List में शामिल कर लिया। सूची में उनके विरुद्ध टिप्पणी दर्ज की गई कि उन्होंने गलत कानूनी राय दी और शीर्षक (Title) की जांच में लापरवाही बरती, जिससे बैंक को वित्तीय जोखिम हुआ।

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अधिवक्ता का कहना था कि उनका नाम सूची में शामिल करने से पहले उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर मिला। इस कार्रवाई के कारण अन्य बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों में भी उनकी पेशेवर साख प्रभावित हुई।

हाई कोर्ट ने याचिका की थी खारिज

अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि Indian Banks’ Association संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” (State) नहीं है, इसलिए उसके विरुद्ध रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

इस आदेश को चुनौती देते हुए अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने अनुच्छेद 226 की व्याख्या अत्यंत संकीर्ण तरीके से की।

पीठ ने कहा कि मामला केवल बैंक और उसके पैनल अधिवक्ता के बीच अनुबंध का नहीं है, बल्कि IBA की Caution List में नाम शामिल होने से अधिवक्ता की पेशेवर प्रतिष्ठा, भविष्य के अवसर और आजीविका प्रभावित होती है। इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत पेशा अपनाने के मौलिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा केवल इस आधार पर सीमित नहीं की जा सकती कि संबंधित संस्था “राज्य” है या नहीं। यदि किसी संस्था की कार्रवाई में सार्वजनिक कानून (Public Law) का तत्व मौजूद है और उससे किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसके विरुद्ध भी रिट जारी की जा सकती है।

RBI की Caution List व्यवस्था केवल धोखाधड़ी के मामलों के लिए

सुप्रीम कोर्ट ने RBI द्वारा जारी विभिन्न परिपत्रों और बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A का विश्लेषण करते हुए कहा कि Caution List का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में धोखाधड़ी (Fraud) रोकना है।

अदालत ने कहा कि RBI की 2009 की सर्कुलर, 2016 के निर्देश और 2024 की Master Directions सभी उन मामलों पर केंद्रित हैं, जहां किसी तीसरे पक्ष या पेशेवर ने बैंकिंग धोखाधड़ी को सुविधाजनक बनाया हो।

पीठ ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का विस्तार केवल कथित पेशेवर लापरवाही या गलत कानूनी राय तक नहीं किया जा सकता।

बैंक पैनल से हटा सकता है, लेकिन पेशेवर कदाचार घोषित नहीं कर सकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई बैंक किसी अधिवक्ता की सेवाओं से संतुष्ट नहीं है, तो वह उसे अपने पैनल से हटा सकता है या भविष्य में नियुक्त न करने का निर्णय ले सकता है।

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हालांकि, बैंक या IBA को यह अधिकार नहीं है कि वे अधिवक्ता को “Fraud” से जुड़ी सूची में डालकर उसकी पेशेवर क्षमता या ईमानदारी पर सार्वजनिक टिप्पणी करें।

अदालत ने कहा कि यदि किसी अधिवक्ता के विरुद्ध वास्तव में पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) का आरोप है, तो संबंधित बैंक को Advocates Act, 1961 के तहत सक्षम राज्य बार काउंसिल के समक्ष शिकायत दर्ज करनी चाहिए।

अधिवक्ता का नाम तुरंत हटाने का निर्देश

चूंकि अपीलकर्ता के विरुद्ध केवल कथित लापरवाही का आरोप था और धोखाधड़ी, मिलीभगत या आपराधिक कदाचार का कोई आरोप नहीं था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने IBA Caution List में उनका नाम शामिल किए जाने को अधिकार क्षेत्र से बाहर (Without Jurisdiction) और अवैध करार दिया।

अदालत ने सभी प्रतिवादियों को तत्काल प्रभाव से अपीलकर्ता का नाम Caution List से हटाने का निर्देश दिया।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भी जारी किए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस अवसर पर Bar Council of India (BCI) को अपनी अनुशासनिक व्यवस्था का Performance Audit कराने का निर्देश दिया।

साथ ही अदालत ने BCI से अधिवक्ताओं के लिए Continuing Legal Education (CLE) की संस्थागत व्यवस्था विकसित करने तथा National Legal Academy (NLA) स्थापित करने की संभावना पर भी विचार करने को कहा।

31 अगस्त 2026 को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने CLE और National Legal Academy से जुड़े मुद्दों पर आगे के निर्देशों के लिए मामले को 31 अगस्त 2026 को सूचीबद्ध किया है।


मामला

Ajay Vijh v. Indian Banks Association, निर्णय दिनांक 7 जुलाई 2026


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