इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आरोपी महिला को बेटी के प्रेमी की हत्या के जुर्म में दी जमानत-

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में अपनी बेटी के प्रेमी की हत्या के आरोप में महिला को जमानत दे दी है।

न्यायमूर्ति राजीव जोशी ने दाताराम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करने के बाद सुलेखा को जमानत दे दी।

हाई कोर्ट ने अपने दिए आदेश मे कहा गया, “दोनों पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद, आरोप की प्रकृति, दोषसिद्धि के मामले में सजा की गंभीरता, सहायक साक्ष्य की प्रकृति, आरोप के समर्थन में प्रथम दृष्टया संतुष्टि, सजा के सुधारात्मक सिद्धांत, अनुच्छेद 21 के बड़े आदेश पर विचार करते हुए भारत के संविधान और दाताराम सिंह बनाम यूपी राज्य [(2018) 3 SCC 22] के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और मामले के गुण-दोष पर कोई विचार व्यक्त किए बिना, मैं इसे जमानत का मामला मानता हूं।”

केस की पृष्ठभूमि –

मृतक के भाई की शिकायत के आधार पर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि मृतक घर से बाहर गया था और वापस नहीं आया था।

व्यक्ति का शव 14 अक्टूबर 2019 को आवेदक के पति सह-आरोपी मुन्ना उर्फ हरिओम के घर के तहखाने से बरामद किया गया था।

आवेदक-पत्नी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 201 (सबूत गायब करना) और 365 (व्यक्ति को कैद करने के इरादे से अपहरण) के तहत फंसाया और आरोपित किया गया था।

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आवेदक के वकील ने बताया कि आवेदक के खिलाफ अपराध करने का कथित मकसद यह था कि मृतक का आवेदक की बेटी से प्रेम संबंध था, जो सह-आरोपियों में से एक थी।

यह तर्क दिया गया था कि आरोपी निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि मौत का कारण गला घोंटने के कारण दम घुटना था, लेकिन इस संबंध में आवेदक के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सबूत नहीं था।

यह आगे प्रस्तुत किया गया था कि आरोप तय नहीं किए गए हैं और आवेदक एक महिला होने के नाते अंतरिम राहत की हकदार है।

यह भी तर्क दिया गया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और यदि जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगी बल्कि मुकदमे में सहयोग करेगी। 

महत्वपूर्ण रूप से, यह तर्क दिया गया था कि भारी डॉकट के कारण निकट भविष्य में समाप्त होने वाले वर्तमान मामले में सुनवाई की कोई संभावना नहीं है।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से पेश हुए ए॰जी॰ए॰ ने जमानत की प्रार्थना का पुरजोर विरोध किया, लेकिन अदालत ने कहा कि वह आवेदक के वकील द्वारा तर्क दिए गए तथ्यों और कानूनी प्रस्तुतियों पर विवाद नहीं कर सकता।

कोर्ट ने आवेदक को जमानत दे दी।

case Title – Smt. Sulekha vs State of UP

CRIMINAL MISC. BAIL APPLICATION No. – 19347 of 2021

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