संसद की समिति की सिफारिश का भी उल्लेख
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 69 के तहत शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने का अपराध महिला के संबंध में लागू होता है। बरेली के मामले में ट्रांसजेंडर शिकायतकर्ता की पहचान और कानून की परिभाषा पर विचार करते हुए आरोपी को जमानत दी गई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69 के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस प्रावधान के तहत अपराध के लिए पीड़ित का कानून में निर्धारित ‘महिला’ की श्रेणी में आना आवश्यक है। अदालत ने बरेली में एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की शिकायत पर दर्ज मामले में प्रथम दृष्टया माना कि धारा 69 के तहत अपराध नहीं बनता और आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने 15 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि धारा 69 के उद्देश्य से लिंग परिवर्तन सर्जरी कराने वाली ट्रांस महिला भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की श्रेणी में आएगी और उसे इस प्रावधान में प्रयुक्त ‘महिला’ की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणी केवल BNS की धारा 69 में प्रयुक्त ‘महिला’ शब्द की व्याख्या तक सीमित है। इसे किसी अन्य अपराध या कानूनी प्रावधान पर लागू नहीं माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि वह आरोपी के साथ डेढ़ साल से अधिक समय तक संबंध में रही। उसके अनुसार, आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया था, उससे पांच लाख रुपये से अधिक की रकम ली, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से इनकार कर दिया।
शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ BNS की धारा 69 के अलावा धारा 352 (शांति भंग कराने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और धारा 351(3) (गंभीर आपराधिक धमकी) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।
आरोपी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि शिकायतकर्ता ने अपने बयान में स्वीकार किया है कि जन्म के समय उसे पुरुष के रूप में निर्धारित किया गया था और अप्रैल 2023 में उसने जननांग पुनर्निर्माण की सर्जरी कराई थी। यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता ने आरोपी को संबंध शुरू होने से पहले ही अपने ट्रांसजेंडर होने की जानकारी दे दी थी।
बचाव पक्ष ने अगस्त में डॉक्टरों के एक पैनल की रिपोर्ट का भी हवाला दिया। उसके अनुसार, रिपोर्ट में शिकायतकर्ता के शरीर में सर्जरी के बाद जननांग संबंधी बदलाव होने, लेकिन गर्भाशय नहीं होने का उल्लेख था।
BNS की धारा 69 पर क्या थी बहस?
BNS की धारा 69 धोखे से या शादी करने के ऐसे वादे के आधार पर यौन संबंध बनाने से संबंधित है, जिसे पूरा करने का इरादा न हो, बशर्ते मामला बलात्कार की श्रेणी में न आता हो। इस प्रावधान में ‘महिला’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है।
आरोपी के वकील ने दलील दी कि इस धारा के आवश्यक तत्व पूरे होने के लिए पीड़ित का कानून में निर्धारित महिला की श्रेणी में आना जरूरी है। बचाव पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता के अपने बयान के आधार पर धारा 69 लागू नहीं होती।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद महिला हार्मोन और बदले हुए जननांगों वाले व्यक्ति को महिला की परिभाषा से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल गर्भाशय नहीं होने या जन्म के समय पुरुष निर्धारित किए जाने से किसी व्यक्ति को महिला की श्रेणी से बाहर नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने ‘महिला’ और ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा पर क्या कहा?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में दी गई परिभाषा पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि इस परिभाषा के अनुसार, जन्म के समय पुरुष निर्धारित किए गए किसी व्यक्ति के लिंग परिवर्तन की सर्जरी के बाद महिला बनने या जन्म के समय महिला निर्धारित किए गए व्यक्ति के पुरुष बनने से उसकी पहचान ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में बनी रहती है।
पीठ ने धारा 69 के संदर्भ में कहा कि इस प्रावधान में प्रयुक्त ‘महिला’ शब्द का अर्थ महिला मानव व्यक्ति है और शिकायतकर्ता के अपने बयान के आधार पर प्रथम दृष्टया धारा 69 के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते।
इसी आधार पर अदालत ने माना कि आरोपी जमानत का हकदार है और उसे रिहा करने का आदेश दिया।
संसद की समिति की सिफारिश का भी उल्लेख
हाईकोर्ट ने दिसंबर 2023 में संसद की गृह मामलों संबंधी स्थायी समिति की उस सिफारिश का भी उल्लेख किया, जो राज्यसभा में प्रस्तुत और लोकसभा में रखी गई रिपोर्ट में शामिल थी।
रिपोर्ट की सिफारिश संख्या 17 में कहा गया था कि BNS में बलात्कार से संबंधित प्रावधान महिला तक सीमित है और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं करता। समिति ने ट्रांस महिलाओं को बलात्कार संबंधी प्रावधान के दायरे में लाने के लिए कानून में आवश्यक संशोधन की सिफारिश की थी।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, यह सिफारिश स्वीकार नहीं की गई और BNS में ‘महिला’ शब्द की परिभाषा में ट्रांसजेंडर महिलाओं को स्पष्ट रूप से शामिल करने वाला संशोधन नहीं हुआ।
अदालत ने अपने आदेश का दायरा स्पष्ट किया
पीठ ने विशेष रूप से कहा कि उसकी टिप्पणियां केवल BNS की धारा 69 के तहत ‘महिला’ शब्द की व्याख्या से संबंधित हैं। इन्हें दूसरे अपराधों, अन्य कानूनों या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के बारे में कोई व्यापक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
कानूनी महत्व: यह आदेश BNS की धारा 69 के दायरे और उसमें प्रयुक्त ‘महिला’ शब्द की व्याख्या से जुड़ा है। जमानत का आदेश अंतिम दोषमुक्ति नहीं है और न ही इससे मामले में लगाए गए अन्य आरोप स्वतः समाप्त हो जाते हैं। अदालत की टिप्पणी को उसके तथ्यात्मक और कानूनी संदर्भ में ही समझना आवश्यक है।
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