इलाहाबाद हाईकोर्ट: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निर्धारित तरीके से तलाक देने पर विवाह समाप्त, फैमिली कोर्ट को तलाक घोषित करने का निर्देश

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मुस्लिम पर्सनल लॉ तलाक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यदि पति इस्लामी कानून के अनुसार तलाक देता है, तो विवाह उसी समय समाप्त माना जाएगा। अदालत ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए दंपति को तलाकशुदा घोषित करने का निर्देश दिया।


मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के तहत यदि पति इस्लामी कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तलाक (Talaq) का उच्चारण करता है, तो पति-पत्नी का विवाह कानूनी रूप से समाप्त माना जाएगा।

अदालत ने इस आधार पर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अलग रह रहे दंपति को तलाक घोषित करने से इनकार कर दिया गया था।


किन जजों ने सुनाया फैसला?

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने 3 जुलाई को यह फैसला सुनाया।

पीठ ने कहा कि मुस्लिम वैवाहिक कानून में तलाक, खुला (Khula) और मुबारात (Mubaraat) अलग-अलग प्रकार के वैवाहिक विच्छेद हैं।

अदालत के अनुसार—

  • तलाक (Talaq) : पति द्वारा दिया गया तलाक।
  • खुला (Khula) : पत्नी की पहल पर विवाह विच्छेद।
  • मुबारात (Mubaraat) : पति-पत्नी की आपसी सहमति से तलाक।

अदालत ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत न्यायालय के बाहर (Extra-Judicial) दिया गया तलाक उसी समय पूर्ण हो जाता है, जब पति शरीयत में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तलाक का उच्चारण करता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा तलाक संवैधानिक न्यायिक प्रक्रिया से बाहर होने के बावजूद मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत मान्य हो सकता है, यदि वह निर्धारित विधि के अनुसार दिया गया हो।


क्या है तलाक-ए-हसन (Talaq-e-Hasan)?

अदालत ने बताया कि तलाक-ए-हसन इस्लामी कानून में तलाक का एक स्वीकृत, वैध और वापस लिया जा सकने वाला (Revocable) तरीका है।

इसमें पति एक साथ तीन तलाक नहीं देता, बल्कि एक-एक महीने के अंतराल पर तीन बार तलाक की घोषणा करता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य जल्दबाजी में लिए गए फैसलों से बचना और पति-पत्नी को सुलह का अवसर देना है।

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इला, ज़िहार और लियान पर भी की टिप्पणी

पीठ ने यह भी कहा कि इला (Ila), ज़िहार (Zihar) और लियान (Lian) इस्लामी न्यायशास्त्र में वर्णित पारंपरिक और प्राचीन प्रकार के सशर्त तलाक हैं, लेकिन इन्हें इस्लामी कानून द्वारा समाप्त (Abolished) कर दिया गया है।


फतवा पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

पति ने तलाक की घोषणा के बाद दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ से एक फतवा भी प्राप्त किया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि फतवा किसी न्यायालय का फैसला नहीं होता, बल्कि इस्लामी कानून के विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों के आधार पर दी गई एक विशेषज्ञ राय (Expert Opinion) होती है।

अदालत ने कहा कि दारुल उलूम नदवतुल उलेमा का दार-उल-इफ्ता विभाग धार्मिक कानूनों से जुड़े प्रश्नों पर राय देता है, जिन्हें सामान्यतः फतवा कहा जाता है।


क्या है पूरा मामला?

दंपति का विवाह 1 फरवरी 2022 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ था।

वैवाहिक विवादों के चलते पत्नी 12 सितंबर 2023 को ससुराल छोड़कर अलग रहने लगी।

पति ने पहले इस्लामी मध्यस्थता केंद्र (Islamic Mediation Centre) के माध्यम से समझौते का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद पत्नी द्वारा तलाक की मांग किए जाने पर पति ने तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया अपनाई।

उसने क्रमशः 22 जुलाई, 22 अगस्त और 25 सितंबर 2024 को एक-एक महीने के अंतराल पर तीन तलाक नोटिस भेजे। पत्नी ने स्वीकार किया कि उसे तीनों नोटिस प्राप्त हुए थे।

बाद में पति ने फतवा भी प्राप्त किया, जिसमें कहा गया कि विवाह समाप्त हो चुका है।


मेहर की राशि भी अदा की गई

तलाक की प्रक्रिया के दौरान पति ने पत्नी को 1 लाख रुपये मेहर के रूप में भी अदा किए।

इसके बाद पति ने अपनी वैवाहिक स्थिति की आधिकारिक घोषणा (Declaration) के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की।

पत्नी ने भी अपने लिखित जवाब और गवाही में तलाक स्वीकार किया तथा विवाह समाप्त घोषित किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

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फैमिली कोर्ट ने क्यों किया था इनकार?

फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि जब दोनों पक्ष तलाक को लेकर विवाद नहीं कर रहे हैं, तब Specific Relief Act के तहत अलग से घोषणा (Declaratory Decree) की आवश्यकता नहीं है।

इसी आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।


किन कानूनों का किया उल्लेख?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित कानूनों का उल्लेख किया—

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937
  • मिसलेनियस पर्सनल लॉज (एक्सटेंशन) एक्ट, 1959
  • मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 (Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939)

अदालत ने कहा कि इन कानूनों से स्पष्ट है कि मुस्लिमों के विवाह विच्छेद से जुड़े मामलों में निर्णय का आधार मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) ही होगा।


हाईकोर्ट का निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपनी वैवाहिक स्थिति के संबंध में स्पष्ट और निश्चित कानूनी पहचान का अधिकार है।

अदालत ने माना कि यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तलाक की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, तो उचित मामलों में न्यायालय द्वारा उस वैवाहिक स्थिति को औपचारिक मान्यता देना आवश्यक है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए उसे दंपति की वैवाहिक स्थिति तलाकशुदा घोषित करने का निर्देश दिया।


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