“An advocate cannot use information received in confidence against his client.”
सुप्रीम कोर्ट ने Rehana Khan v. Rizwan Siddhiquee में कहा कि वकील पेशेवर संबंध खत्म होने के बाद भी पूर्व क्लाइंट की गोपनीय जानकारी का उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं कर सकता। कोर्ट ने वकील को
- 2 वर्ष के लिए Roll of Advocates से removal
- ₹3 लाख अपीलकर्ता को भुगतान
- ₹2 लाख Bar Council of India Welfare Fund में जमा करने
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ—जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई—ने स्पष्ट किया कि वकील-क्लाइंट के बीच विश्वास और गोपनीयता का दायित्व पेशेवर संबंध समाप्त होने के बाद भी खत्म नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि:
“An advocate cannot use information received in confidence against his client.”
अर्थात, किसी वकील को अपने क्लाइंट से पेशेवर संबंध के दौरान मिली गोपनीय जानकारी को बाद में उसी क्लाइंट के खिलाफ इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने साथ ही यह महत्वपूर्ण सिद्धांत भी दोहराया कि वकील का दायित्व क्लाइंट के बाद के आचरण पर निर्भर नहीं करता। यदि क्लाइंट बाद में वकील का विरोधी बन जाए या उसके खिलाफ आरोप लगाए, तब भी वकील को पूर्व क्लाइंट की गोपनीय जानकारी सार्वजनिक करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
टीवी इंटरव्यू में पूर्व क्लाइंट की निजी बातचीत उजागर करने का मामला
मामला वर्ष 2013-14 में शुरू हुआ, जब अपीलकर्ता ने संबंधित अधिवक्ता को कुछ गंभीर आरोपों के संबंध में कानूनी सहायता के लिए नियुक्त किया था। इस दौरान उसने वकील के साथ संवेदनशील और गोपनीय सामग्री साझा की।
बाद में दोनों के बीच विवाद हुआ और महिला ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज कराई। इसी घटनाक्रम के बीच अधिवक्ता ने 5 अगस्त 2014 को Aaj Tak और Zee News पर इंटरव्यू दिए, जिसमें उसने महिला के साथ अपने पेशेवर संबंध, उसके द्वारा बताई गई बातें तथा कथित बातचीत और मैसेजिंग से संबंधित सामग्री सार्वजनिक की।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आचरण को पेशेवर गोपनीयता के दायित्व का गंभीर उल्लंघन माना।
“क्लाइंट अब विरोधी है” — यह बचाव स्वीकार नहीं
अधिवक्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि महिला ने बाद में उसके खिलाफ FIR में आरोप लगाए थे और वह स्वयं भी मीडिया में उसके विरुद्ध बोल चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि:
क्लाइंट का बाद का व्यवहार वकील के पेशेवर दायित्व को समाप्त नहीं करता।
यदि वकील को लगता है कि उसके खिलाफ झूठे आरोप लगाए गए हैं, तो उसके पास कानून के तहत उचित उपाय उपलब्ध हैं—जांच एजेंसी के समक्ष अपना पक्ष रखना या मानहानि की कार्रवाई करना। लेकिन वह टेलीविजन पर जाकर पूर्व क्लाइंट की गोपनीय बातचीत या पेशेवर जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकता।
अनुशासन समिति ने वकील को 2 साल के लिए बार से हटाया था
Bar Council of India की Disciplinary Committee ने 11 अगस्त 2025 को अधिवक्ता के खिलाफ पेशेवर कदाचार साबित पाया था।
समिति ने माना कि:
- बिना अधिकृत अनुमति के कानूनी नोटिस जारी किया गया;
- क्लाइंट से संबंधित गोपनीय जानकारी सार्वजनिक की गई;
- मीडिया में उसकी पहचान उजागर हुई;
- उसके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।
इसके बाद अधिवक्ता का नाम दो वर्ष के लिए Roll of Advocates से हटाने का आदेश दिया गया। इस अवधि में उसे किसी कोर्ट, ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण के समक्ष अधिवक्ता के रूप में पेश होने से भी रोक दिया गया था।
साथ ही ₹3 लाख अपीलकर्ता को और ₹2 लाख Bar Council of India Welfare Fund में जमा करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मूल दंड में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
वकील की याचिका भी खारिज, नोटिस न मिलने का तर्क “afterthought”
अधिवक्ता ने यह भी दावा किया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही की अंतिम सुनवाई का उचित नोटिस उसे सही पते पर नहीं मिला था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को “flimsy” और “afterthought” करार दिया। कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि अधिवक्ता कार्यवाही में उपस्थित हुआ था, लिखित जवाब दाखिल किया था, वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व किया था और साक्ष्य की प्रक्रिया में भी भाग लिया था।
कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति पूरी कार्यवाही में मौजूद रहा हो, वह बाद में यह नहीं कह सकता कि वह अनुपस्थित था—विशेषकर तब जब वह स्वयं अधिवक्ता हो।
अपीलकर्ता को भी राहत बढ़ाने से इनकार
दिलचस्प रूप से, सुप्रीम कोर्ट ने केवल अधिवक्ता के आचरण की आलोचना नहीं की। महिला की ओर से दायर अपील में भी अतिरिक्त राहत देने से इनकार कर दिया।
महिला ने अधिवक्ता के खिलाफ और कठोर कार्रवाई तथा अधिक मुआवजे की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने पाया कि उसने भी मामले के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का पूरा खुलासा नहीं किया था।
कोर्ट ने रिकॉर्ड में पाया कि पेशेवर संबंध के दौरान महिला और अधिवक्ता के बीच पुलिस अधिकारी को “trap” करने के तरीकों पर भी बातचीत हुई थी। इसके अलावा, महिला स्वयं भी 28 जुलाई 2014 को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने अपना मामला रख चुकी थी, जबकि बाद में उसने मामले के सार्वजनिक होने की शिकायत की।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि संबंधित पुलिस अधिकारी को ट्रायल कोर्ट ने 4 दिसंबर 2015 को discharge कर दिया था और उस आदेश को चुनौती नहीं दी गई थी।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता ने भी पूर्ण candour के साथ अदालत का रुख नहीं किया था।
दोनों पक्षों पर ₹5-₹5 लाख की लागत
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः दोनों पक्षों की अपीलें खारिज कर दीं और दोनों पर ₹5 लाख-₹5 लाख की अतिरिक्त लागत लगाई।
यह राशि Supreme Court Legal Services Committee में चार सप्ताह के भीतर जमा करनी होगी।
इसके अलावा, अनुशासन समिति द्वारा अधिवक्ता पर लगाया गया:
- 2 वर्ष के लिए Roll of Advocates से removal
- ₹3 लाख अपीलकर्ता को भुगतान
- ₹2 लाख Bar Council of India Welfare Fund में जमा करने
का आदेश बरकरार रहा।
“यह समय दूसरे मुकदमों का था”
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद कोर्ट की वह टिप्पणी है जिसमें उसने दोनों पक्षों द्वारा लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में समय खर्च करने पर गंभीर नाराजगी जताई।
कोर्ट ने कहा:
“Each of these parties has come to us complaining of a wrong, and each has been the author of a good part of it.”
कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों ने Bar Council of India, High Court और Supreme Court का 11 वर्षों तक समय लिया, जबकि यह समय उन अन्य मुकदमादारों का था जो वास्तविक और जरूरी राहत के लिए अदालतों में प्रतीक्षा कर रहे हैं।
फैसले का कानूनी महत्व
इस निर्णय से कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत उभरते हैं:
- वकील-क्लाइंट की गोपनीयता पेशेवर संबंध समाप्त होने के बाद भी बनी रहती है।
- पूर्व क्लाइंट के खिलाफ गोपनीय जानकारी का इस्तेमाल करना पेशेवर कदाचार हो सकता है।
- मीडिया में जाकर पूर्व क्लाइंट की confidential communications सार्वजनिक करना उचित कानूनी बचाव नहीं है।
- वकील के खिलाफ आरोप लगने पर उसके पास कानूनी remedies हैं, लेकिन वह professional confidence को सार्वजनिक नहीं कर सकता।
- अदालत से enhanced relief मांगने वाला पक्ष भी clean hands और पूर्ण candour के साथ आना चाहिए।
- दोनों पक्षों के गलत आचरण के बावजूद अदालत न्यायिक प्रक्रिया को व्यक्तिगत विवाद का मंच बनने की अनुमति नहीं देगी।
कुल मिलाकर, फैसला केवल वकील की confidentiality duty पर नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर भी एक कड़ा संदेश है।
केस: Rehana Khan v. Rizwan Siddhiquee, Civil Appeal No. 12256 of 2025, निर्णय दिनांक 21 अगस्त 2026।
Tags
#सुप्रीमकोर्ट #SupremeCourt #वकील_क्लाइंट_गोपनीयता #AdvocateClientConfidentiality #ProfessionalMisconduct #AdvocatesAct #BarCouncilOfIndia #LegalEthics #ProfessionalEthics #RehanaKhan #RizwanSiddhiquee #JudicialDiscipline #LegalProfession
