मां की कमाई से पिता की बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आधी नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मां के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने मात्र से पिता के बच्चों के भरण-पोषण का दायित्व कम नहीं किया जा सकता। दो नाबालिग बेटियों के लिए ₹60,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण बहाल किया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मां के नौकरीपेशा या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने मात्र से पिता के बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व को आधा नहीं किया जा सकता। बच्चों की जरूरतों को पूरा करना दोनों माता-पिता की जिम्मेदारी है, लेकिन इस जिम्मेदारी को केवल आय के अनुपात में गणितीय रूप से बांटा नहीं जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए दो नाबालिग बेटियों के लिए पिता द्वारा दिए जाने वाले अंतरिम भरण-पोषण को ₹60,000 से घटाकर ₹30,000 प्रति माह कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित ₹60,000 प्रतिमाह की राशि बहाल करते हुए पिता को निर्देश दिया कि भरण-पोषण की पूरी बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर किया जाए।
मां स्त्री रोग विशेषज्ञ और ₹1.5 लाख कमाती हैं
मामले में दोनों बच्चियां 8 और 9 वर्ष की हैं और अपनी मां के साथ रहती हैं। मां एक स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और लगभग ₹1.5 लाख प्रति माह कमाती हैं।
इसी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिता की ओर से देय अंतरिम भरण-पोषण की राशि ₹60,000 से घटाकर ₹30,000 कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।
बच्चों की देखभाल केवल पैसे से नहीं मापी जा सकती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों माता-पिता पर बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है, लेकिन इसे केवल आय के आधार पर बराबर-बराबर बांटना उचित नहीं होगा।
पीठ ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि दोनों छोटी बेटियां मां के साथ रहती हैं और मां अपनी नौकरी के साथ-साथ उनकी दैनिक जरूरतों, शिक्षा, देखभाल और पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी caregiving responsibility को केवल मौद्रिक मूल्य में नहीं आंका जा सकता।
इसलिए मां का कमाना अपने आप में पिता के भरण-पोषण दायित्व को आधा करने का आधार नहीं बन सकता।
पिता खुद डॉक्टर हैं और ₹2 लाख कमाते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पिता स्वयं एक योग्य डॉक्टर हैं और उन्होंने अदालत के समक्ष अपनी आय लगभग ₹2 लाख प्रति माह बताई थी।
पीठ ने कहा कि:
“यदि पत्नी की कमाई को अलग भी रख दिया जाए तो भी हाईकोर्ट द्वारा की गई कटौती सही नहीं ठहराई जा सकती है।”
कोर्ट के अनुसार, स्कूल जाने वाली दो छोटी बच्चियों की शिक्षा और पालन-पोषण के लिए ₹60,000 प्रतिमाह की राशि ऐसे पिता की आय के संदर्भ में अत्यधिक नहीं है।
माता-पिता की जिम्मेदारी का सीधा गणित नहीं लगाया जा सकता
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के maintenance को केवल इस फार्मूले से निर्धारित करने से इनकार किया कि:
पिता की आय + मां की आय = दोनों के अनुपात में खर्च।
बच्चों के भरण-पोषण का निर्धारण करते समय अदालत को उनकी उम्र, शिक्षा, रहने की स्थिति, दैनिक आवश्यकताओं, माता-पिता की आर्थिक क्षमता और वास्तविक caregiving responsibilities सहित समग्र परिस्थितियों को देखना होगा।
इस मामले में मां की आय होने के बावजूद वह बच्चों की प्रत्यक्ष और दैनिक देखभाल भी कर रही थी। इसलिए उसकी आय को पिता की देय राशि घटाने का स्वतः आधार नहीं बनाया जा सकता।
₹60,000 का अंतरिम भरण-पोषण बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित ₹60,000 प्रति माह के अंतरिम maintenance को बहाल कर दिया।
साथ ही पिता को निर्देश दिया गया कि अब तक की सभी बकाया राशि तीन महीने के भीतर अदा की जाए।
फैसले का कानूनी महत्व
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहां यह तर्क दिया जाता है कि “मां कमाती है, इसलिए पिता की maintenance liability कम होनी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है—मां की आय एक relevant factor हो सकती है, लेकिन वह अकेले पिता के दायित्व को कम करने या आधा करने का निर्णायक आधार नहीं है। बच्चों का हित और उनकी वास्तविक जरूरतें सर्वोपरि रहेंगी।
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