न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए 3 वर्ष की वकालत की शर्त को महत्वपूर्ण रूप से किया संशोधित, अनुभव की शर्त बरकरार – SC

Like to Share

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए 3 साल के अनुभव की शर्त बरकरार रखी, लेकिन नियम में बड़ा बदलाव

सुप्रीम कोर्ट ने 2:1 बहुमत से 2025 में लागू 3 साल के अनुभव की शर्त को बरकरार रखते हुए इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए। अब न्यायिक प्रशिक्षण और सुपरवाइज्ड क्लर्कशिप को अनुभव में शामिल किया जाएगा; अप्रैल 2027 से कम-से-कम एक वर्ष की वास्तविक वकालत अनिवार्य होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायपालिका में सिविल जज के रूप में सीधे प्रवेश के लिए पेशेवर अनुभव की आवश्यकता को बरकरार रखा है, लेकिन 2025 के अपने फैसले में निर्धारित तीन वर्ष की वकालत की शर्त को महत्वपूर्ण रूप से संशोधित किया है।

CJI सूर्यकांत और जस्टिस ए.जी. मसीह की बहुमत पीठ ने 2:1 के फैसले में माना कि न्यायिक सेवा में प्रवेश करने वाले उम्मीदवारों को अदालतों के कामकाज का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। हालांकि, इस उद्देश्य के लिए पूरा अनुभव केवल बार में प्रैक्टिस से हासिल करना आवश्यक नहीं है।

बहुमत ने न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का प्रशिक्षण और एक वर्ष की सुपरवाइज्ड क्लर्कशिप को भी इस व्यावहारिक अनुभव के हिस्से के रूप में मान्यता दी है।

वहीं, जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने असहमति जताते हुए कहा कि 2025 में तय की गई मूल तीन वर्ष की बार प्रैक्टिस की शर्त में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए।

2025 के फैसले में क्या तय हुआ था?

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के रुख को बदलते हुए न्यायिक सेवा परीक्षा में सीधे कानून की डिग्री के बाद प्रवेश पर रोक लगाई थी।

कोर्ट ने कहा था कि नए कानून स्नातकों को न्यायिक अधिकारी बनने से पहले तीन वर्ष का प्रासंगिक अनुभव हासिल करना चाहिए। यह अवधि राज्य बार काउंसिल में नामांकन की तारीख से गिनी जानी थी और कुछ परिस्थितियों में न्यायाधीशों के साथ लॉ क्लर्क के रूप में किया गया कार्य भी इसमें शामिल किया जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि न्यायाधीश को अपने पहले ही दिन ऐसे मामलों पर निर्णय लेना होता है जिनका संबंध जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और व्यक्तिगत अधिकारों से होता है। इसलिए केवल किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है।

अब 2026 के फैसले में क्या बदलाव आया?

नई व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता को बरकरार रखते हुए यह स्वीकार किया कि अदालतों के कामकाज से परिचय केवल वकालत के जरिए ही हासिल नहीं होता।

बहुमत ने कहा कि व्यावहारिक अनुभव “professional and institutional experience” के संयोजन से भी प्राप्त किया जा सकता है।

इसके तहत:

  • एक वर्ष की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग
  • एक वर्ष की सुपरवाइज्ड क्लर्कशिप
  • और निर्धारित अवधि की वास्तविक प्रैक्टिस

को न्यायिक सेवा के लिए आवश्यक व्यावहारिक exposure के संदर्भ में देखा जाएगा।

2025 से 31 मार्च 2027 तक संक्रमणकालीन व्यवस्था

कोर्ट ने उन उम्मीदवारों के लिए विशेष व्यवस्था की है जो 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच संक्रमणकालीन अवधि में हैं।

Must Read -  सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC की स्तन दबाना, पायजामा-स्ट्रिंग तोड़ना ‘रेप प्रयास नहीं’ वाली टिप्पणी पर लगाई रोक, ट्रायल गंभीर धाराओं में जारी रखने का निर्देश

इस अवधि में चयनित उम्मीदवारों के लिए:

  • एक वर्ष की प्रैक्टिस को deemed completion माना जाएगा;
  • इसके बाद एक वर्ष State Judicial Academy में “Training Judicial Officer” के रूप में प्रशिक्षण होगा;
  • साथ ही एक वर्ष की supervised clerkship होगी;
  • ये दोनों अवधियां तीन वर्ष की आवश्यक अवधि में गिनी जाएंगी।

इस प्रकार कोर्ट ने 2025 के फैसले से उत्पन्न उस कठिनाई को कम करने का प्रयास किया है जिसमें बड़ी संख्या में कानून स्नातकों के लिए अचानक न्यायिक सेवा परीक्षा के रास्ते में तीन वर्ष की बाध्यता आ गई थी।

अप्रैल 2027 से वास्तविक प्रैक्टिस जरूरी

1 अप्रैल 2027 से व्यवस्था और स्पष्ट होगी।

उस तारीख के बाद न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों को कम-से-कम एक वर्ष की वास्तविक वकालत का अनुभव होना आवश्यक होगा।

इस प्रैक्टिस को संबंधित हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रमाणित किया जाएगा।

हालांकि परीक्षा पास करने के बाद भी चयनित उम्मीदवारों को:

1 वर्ष न्यायिक अकादमी प्रशिक्षण + 1 वर्ष सुपरवाइज्ड क्लर्कशिप

से गुजरना होगा, जिसके बाद वे नियमित न्यायिक कार्य संभालेंगे।

महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों की व्यावहारिक कठिनाइयों को माना

बहुमत ने यह भी स्वीकार किया कि बार में स्थापित होने का अवसर सभी उम्मीदवारों के लिए समान नहीं होता।

कोर्ट ने विशेष रूप से माना कि महिला उम्मीदवारों को सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण शुरुआती वर्षों में स्वतंत्र प्रैक्टिस करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए भी सार्थक प्रैक्टिस के अवसर हमेशा समान रूप से उपलब्ध नहीं होते।

हालांकि, कोर्ट ने इन वर्गों के लिए अलग पात्रता मानदंड निर्धारित नहीं किए।

LLM या उच्च शिक्षा को प्रैक्टिस का विकल्प नहीं माना

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि postgraduate legal education को व्यावहारिक अनुभव का विकल्प नहीं माना जा सकता।

अर्थात LLM या अन्य अकादमिक अध्ययन को बार प्रैक्टिस अथवा अदालतों के वास्तविक कामकाज से परिचय के बराबर नहीं माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि अकादमिक उत्कृष्टता महत्वपूर्ण है, लेकिन वह न्यायिक कार्य के लिए आवश्यक व्यावहारिक समझ का पूर्ण विकल्प नहीं है।

2002 में तीन साल की शर्त हटाई गई थी

तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त का इतिहास भी महत्वपूर्ण है।

1993 में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए तीन वर्ष की वकालत की आवश्यकता को समान रूप से लागू किया था। कोर्ट ने माना था कि बिना किसी पेशेवर अनुभव के कानून स्नातकों को न्यायिक अधिकारी बनाना सफल प्रयोग नहीं रहा।

बाद में जस्टिस के.जे. शेट्टी की अध्यक्षता वाले Shetty Commission ने इस आवश्यकता पर पुनर्विचार किया।

कमिशन का मत था कि कानून के विद्यार्थी internships और clinical training के माध्यम से पहले ही अदालतों से परिचित हो जाते हैं। इसके बाद 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन वर्ष की प्रैक्टिस की अनिवार्यता समाप्त कर दी और fresh law graduates को सीधे judicial service examinations में बैठने की अनुमति दी।

2025 में यह व्यवस्था फिर बदल गई और अब 2026 के फैसले ने उसे एक नए संतुलित रूप में पुनर्गठित किया है।

Must Read -  लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे प्रेमी जोड़े को इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा झटका, कहा-इस्लाम भी विवाह पूर्व संबंध कायम करने के विरुद्ध

जस्टिस के. विनोद चंद्रन का dissent

जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने बहुमत से असहमति जताई।

उनका मत था कि 2025 में निर्धारित तीन वर्ष की वास्तविक बार प्रैक्टिस को बरकरार रखा जाना चाहिए था और judicial academy training या clerkship को उसके विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने चेताया कि न्यायिक सेवा में ऐसे अधिकारियों का वर्ग तैयार नहीं होना चाहिए जो केवल अकादमिक रूप से दक्ष हों, लेकिन वास्तविक जीवन और मुकदमेबाजी की कठिनाइयों से पर्याप्त रूप से परिचित न हों।

उनके अनुसार, न्यायिक अधिकारी नियुक्त होते ही स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में होता है। इसलिए न्यायिक प्रशिक्षण और classroom exposure को वास्तविक litigation experience के बराबर नहीं रखा जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआती वर्षों में युवा वकीलों को भले ही बड़े मुकदमों में बहस का अवसर न मिले, लेकिन इसी अवधि में वे “litigant की परेशानियों और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों” को समझते हैं।

पांच साल बाद होगी समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने नई व्यवस्था को अंतिम और अपरिवर्तनीय मॉडल के रूप में नहीं रखा है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह framework पांच वर्ष तक लागू रहेगा, जिसके बाद इसकी प्रभावशीलता की समीक्षा की जाएगी।

फैसले का व्यापक महत्व

इस फैसले ने मूलतः “experience बनाम accessibility” के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

एक ओर कोर्ट ने माना कि न्यायाधीश बनने से पहले उम्मीदवार को अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली का अनुभव होना चाहिए। दूसरी ओर, उसने यह भी स्वीकार किया कि तीन वर्ष की अनिवार्य स्वतंत्र वकालत युवा और सक्षम कानून स्नातकों के लिए प्रवेश को अत्यधिक कठिन बना सकती है।

इसलिए नया मॉडल इस प्रकार उभरता है:

कानून की डिग्री → आवश्यक प्रारंभिक पेशेवर exposure → न्यायिक सेवा परीक्षा → 1 वर्ष अकादमी प्रशिक्षण + 1 वर्ष supervised clerkship → नियमित न्यायिक पद

इस फैसले से अधीनस्थ न्यायपालिका में भर्ती की पात्रता का ढांचा अगले कुछ वर्षों के लिए महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित होगा, खासकर उन कानून स्नातकों के लिए जो Civil Judge (Junior Division) परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

Tags: #सुप्रीमकोर्ट #न्यायिकसेवा #JudicialService #CivilJudge #JudicialExam #BarPractice #ThreeYearPractice #Judiciary #CJI #SuryaKant #JusticeVinodChandran #JudicialTraining #LawGraduates #SubordinateJudiciary #LegalNews

Leave a Comment