इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-जमानती वारंट के बावजूद आरोपी को कोर्ट में पेश न किए जाने पर मेरठ SSP को शाम 4 बजे तक रुकने का निर्देश दिया। कोर्ट ने CJM के आचरण पर भी गंभीर आपत्ति जताई।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी को अदालत के समक्ष पेश नहीं किए जाने के मामले में मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को शाम 4 बजे तक कोर्ट में उपस्थित रहने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि भले ही लापरवाही एसएसपी के अधीनस्थ कर्मचारियों की ओर से हुई हो, लेकिन वारंट की तामील सुनिश्चित कराने और आरोपी को हाईकोर्ट के सामने पेश कराने की जिम्मेदारी संबंधित पुलिस अधिकारी की थी।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने मामले में एसएसपी के खिलाफ तत्काल कोई कठोर आदेश पारित करने के बजाय उन्हें भविष्य में अधिक सतर्क रहने की हिदायत दी। वहीं, आरोपी को हाईकोर्ट में पेश करने के निर्देश के बावजूद केवल मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), मेरठ के सामने पेश किए जाने पर अदालत ने गंभीर नाराजगी जताई और उनके खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई पर विचार करने का निर्देश दिया।
CJM के आचरण को बताया गंभीर लापरवाही और अनुशासनहीनता
मामले में गैर-जमानती वारंट के अनुपालन के बाद आरोपी को हाईकोर्ट के बजाय मेरठ के सीजेएम के समक्ष पेश किया गया था। सीजेएम ने आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया, लेकिन उसे हाईकोर्ट के सामने पेश कराने के संबंध में कोई निर्देश नहीं दिया।
इस पर हाईकोर्ट ने सीजेएम के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि यह घटना मेरठ के सीजेएम की घोर लापरवाही और अनुशासनहीनता को दर्शाती है।
अदालत ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि आदेश को मेरठ के प्रशासनिक न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, ताकि सीजेएम के खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई की जा सके।
क्या है पूरा मामला?
हाईकोर्ट में यह मामला एक महिला की ओर से दायर जमानत रद्द करने की अर्जी से जुड़ा था। महिला ने आरोपी को 18 मार्च 2026 को एक आपराधिक अपील के मामले में दी गई जमानत निरस्त करने की मांग की थी।
याचिका के अनुसार, आरोपी ने हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ के समक्ष वचन दिया था कि जमानत पर रिहा होने के बाद वह याचिकाकर्ता महिला से शादी करेगा। महिला का आरोप था कि आरोपी ने अपना वादा पूरा नहीं किया। इसी आधार पर उसने आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग की।
आरोपी के अदालत के सामने पेश नहीं होने पर हाईकोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी को हाईकोर्ट के समक्ष पेश किया जाए। वारंट की तामील सुनिश्चित कराने के लिए इसे मेरठ के एसएसपी के पास भेजा गया।
SSP ने छुट्टी पर होने की दी जानकारी
हाईकोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश हुए एसएसपी ने बताया कि वह 28 सितंबर से 2 अक्टूबर तक अवकाश पर थे। उन्होंने संबंधित थाना प्रभारी (SHO) को निर्देश दिया था कि 3 अक्टूबर को काम पर लौटने के बाद वारंट की तामील तत्काल सुनिश्चित की जाए।
वारंट की तामील के बाद आरोपी को मेरठ के सीजेएम के सामने पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। हालांकि, उसे हाईकोर्ट के समक्ष पेश नहीं किया गया, जबकि वारंट में ऐसा करने का स्पष्ट निर्देश था।
एसएसपी ने स्वीकार किया कि उनके अधीनस्थ कर्मचारियों से लापरवाही हुई। उन्होंने यह भी माना कि आरोपी को हाईकोर्ट में पेश कराने के लिए सीजेएम के समक्ष आवश्यक आवेदन किया जाना चाहिए था।
SSP को सतर्क रहने की हिदायत
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया लापरवाही मेरठ के एसएसपी के अधीनस्थ कर्मचारियों की ओर से हुई थी। इसके बावजूद, वारंट के अनुपालन की जिम्मेदारी को देखते हुए अदालत ने एसएसपी को जवाबदेह ठहराया।
हालांकि, अदालत ने उनके खिलाफ कोई कठोर आदेश पारित नहीं किया। इसके बजाय, एसएसपी को शाम 4 बजे तक अदालत में उपस्थित रहने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अधिक सतर्क रहने का निर्देश दिया।
न्यायिक आदेशों के अनुपालन पर हाईकोर्ट का सख्त रुख
यह मामला न्यायिक आदेशों के प्रभावी अनुपालन और पुलिस तथा न्यायिक अधिकारियों की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार आरोपी को पेश करने के लिए जारी वारंट का केवल औपचारिक अनुपालन पर्याप्त नहीं था; आरोपी को उसी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक था, जहां पेश करने का निर्देश दिया गया था।
सीजेएम के आचरण पर प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश से भी स्पष्ट होता है कि न्यायिक आदेशों के पालन में हुई चूक को अदालत ने गंभीरता से लिया। मामले में आगे की प्रशासनिक कार्रवाई का निर्णय संबंधित प्रशासनिक स्तर पर किया जाना है।
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