श्रम न्यायालय का आदेश निरस्त, दो महीने में पुनर्विचार का निर्देश
केरलम हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय बेंच को फैसले में बदलाव का अधिकार होने से उसे एकल न्यायाधीश पर संस्थागत श्रेष्ठता नहीं मिलती। न्यायिक अनुशासन, परस्पर सम्मान और संयम जरूरी हैं।
केरलम | 26 अक्टूबर 2026
केरलम हाईकोर्ट ने न्यायिक अनुशासन और जजों के बीच आपसी सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी साथी न्यायाधीश के फैसले को पलटने या उसमें संशोधन करने की शक्ति से संबंधित न्यायाधीश पर संस्थागत श्रेष्ठता स्थापित नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के सभी न्यायाधीश समान संस्थागत दर्जा रखते हैं और न्यायिक मतभेदों के बावजूद बेंचों के बीच परस्पर सम्मान, संयम तथा सौहार्द बनाए रखना आवश्यक है।
अदालत की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की खंडपीठ ने ‘पीयर रेस्ट्रेंट’ (Peer Restraint) को न्यायिक अनुशासन का मूलभूत तत्व बताया। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायपालिका की शक्ति प्रभुत्व से नहीं, बल्कि अनुशासन से आती है।
न्यायिक अनुशासन केवल बाध्यकारी मिसालों तक सीमित नहीं
खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक संयम का सिद्धांत केवल बाध्यकारी न्यायिक मिसालों के पालन तक सीमित नहीं है। इसमें न्यायिक सौहार्द, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और विभिन्न बेंचों के बीच संस्थागत सामंजस्य भी शामिल हैं। न्यायिक निर्णयों में निरंतरता और पूर्वानुमेयता बनाए रखने के लिए ये सिद्धांत आवश्यक हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी बेंच—चाहे उसकी न्यायिक संरचना में कितने ही न्यायाधीश क्यों न हों—दूसरी बेंच या उसके सदस्यों के प्रति पर्यवेक्षक की तरह व्यवहार नहीं कर सकती। किसी बेंच को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरी बेंच को निर्देश देने, उसके आचरण की आलोचना करने या यह बताने लगे कि उसे किस प्रकार कार्य करना चाहिए अथवा अपने आदेश में क्या लिखना चाहिए।
अपीलीय बेंच को फैसले की समीक्षा का अधिकार, लेकिन संस्थागत श्रेष्ठता नहीं
हाईकोर्ट ने माना कि अपीलीय खंडपीठ किसी एकल न्यायाधीश के निष्कर्षों से असहमत हो सकती है। वैध कानूनी आधार होने पर वह संबंधित फैसले को निरस्त कर सकती है या उसमें संशोधन कर सकती है।
हालांकि, किसी न्यायिक फैसले को सुधारने या पलटने का अधिकार उस फैसले को देने वाले न्यायाधीश को संस्थागत रूप से कमतर नहीं बनाता। अपील का उद्देश्य न्यायिक निर्णय की अतिरिक्त समीक्षा करना है, न कि मूल फैसला देने वाले न्यायाधीश को अपीलीय बेंच के अधीनस्थ के रूप में स्थापित करना।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एकल न्यायाधीश और खंडपीठ, दोनों हाईकोर्ट के न्यायिक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हैं। इंट्रा-कोर्ट अपील न्यायिक जांच का एक अतिरिक्त स्तर प्रदान करती है, लेकिन इससे दोनों के बीच संस्थागत श्रेष्ठता या अधीनस्थता का संबंध पैदा नहीं होता।
मुख्य न्यायाधीश भी ‘समान लोगों में प्रथम’
अदालत ने न्यायपालिका की संस्थागत संरचना का उल्लेख करते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश का पद भी Primus Inter Pares के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है—‘समान लोगों में प्रथम’।
इस सिद्धांत के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक और संस्थागत भूमिका महत्वपूर्ण होने के बावजूद न्यायिक सहयोगियों के बीच आपसी सम्मान और समान दर्जे की भावना बनी रहनी चाहिए।
एकल न्यायाधीश के पास मामला वापस भेजने पर भी की टिप्पणी
ये टिप्पणियां तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी से जुड़े विवाद में की गईं। कर्मचारी ने श्रम न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी करने के लिए निर्धारित समय-सीमा बढ़ाई गई थी।
मामले के पहले चरण में एक खंडपीठ ने इसे एक विशेष मुद्दे पर विचार करने के लिए वापस भेजा था। इसके बाद एकल न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि सामान्यतः खंडपीठ किसी मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए एकल न्यायाधीश के पास वापस नहीं भेजती।
इस संदर्भ में खंडपीठ ने कहा कि यह सामान्य सिद्धांत सही है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में मामला वापस भेजना उचित हो सकता है। यदि कोई महत्वपूर्ण मुद्दा पहले विचारित नहीं हुआ है, तो उसे तय करने के लिए मामला वापस भेजा जा सकता है।
इसके विपरीत, यदि संबंधित मुद्दे पर पहले ही गुण-दोष के आधार पर निर्णय हो चुका है, तो अपीलीय बेंच को सामान्यतः अपील का स्वयं निपटारा करना चाहिए। खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिस मुद्दे पर पहले निर्णय नहीं हुआ है, उसे वापस भेजने से पक्षकार को इंट्रा-कोर्ट अपील की प्रक्रिया के दोनों चरणों में उस मुद्दे पर विचार का अवसर मिल सकता है।
श्रम न्यायालय का आदेश निरस्त, दो महीने में पुनर्विचार का निर्देश
मूल विवाद पर विचार करते हुए खंडपीठ ने श्रम न्यायालय की उस शक्ति को स्वीकार किया, जिसके तहत वह अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी करने की समय-सीमा बढ़ा सकता है।
हालांकि, अदालत ने पाया कि समय-सीमा बढ़ाते समय बैंक की ओर से देरी के संबंध में दिए गए स्पष्टीकरण और कर्मचारी की आपत्तियों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया था।
इसी आधार पर खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए समय-सीमा बढ़ाने वाले आदेश को निरस्त कर दिया और श्रम न्यायालय को संबंधित आवेदन पर दो महीने के भीतर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्टों के लिए व्यापक महत्व
15 अक्टूबर के इस फैसले में व्यक्त सिद्धांत न्यायिक संस्थाओं के कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है। अपीलीय अधिकार न्यायिक त्रुटियों को सुधारने का माध्यम है, किसी अन्य बेंच पर प्रभुत्व स्थापित करने का नहीं।
केरलम हाईकोर्ट की टिप्पणी इस बात पर जोर देती है कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल कानूनी पदानुक्रम से नहीं, बल्कि बेंचों के बीच अनुशासन, संयम, आपसी सम्मान और संस्थागत सौहार्द से भी कायम रहती है।
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