सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर ने 2016 सूरजगढ़ लौह अयस्क खदान आगजनी मामले में अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया। यह इस मामले में तीसरा न्यायिक रिक्यूजल है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर ने मंगलवार को अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग (Recuse) कर लिया।
मामला न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था।
सुनवाई शुरू होते ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू के प्रतिनिधि अधिवक्ता ने मामले को कुछ समय बाद सुनने (Pass Over) का अनुरोध किया।
इस पर न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि मामला अब किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा, क्योंकि न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर को इस मामले की सुनवाई में कठिनाई है।
उन्होंने कहा—
“यह मामला किसी अन्य संयोजन (Bench Combination) के समक्ष जाएगा। मेरे सहयोगी न्यायाधीश को इस मामले की सुनवाई में कठिनाई है। इसे ऐसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, जिसमें हम दोनों में से कोई एक न हो।”
तीसरे न्यायाधीश ने किया रिक्यूजल
इस मामले में अब तक तीन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश स्वयं को सुनवाई से अलग कर चुके हैं।
इससे पहले—
- न्यायमूर्ति अतुल चांदूरकर, तथा
- न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश
भी इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर चुके हैं।
हालांकि, न्यायाधीशों ने अपने रिक्यूजल के कारण सार्वजनिक रूप से नहीं बताए।
क्या है मामला?
सुरेंद्र गाडलिंग ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के 31 जनवरी 2023 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें 2016 सूरजगढ़ लौह अयस्क खदान आगजनी मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप सही प्रतीत होते हैं।
2016 सूरजगढ़ आगजनी मामला
यह मामला 25 दिसंबर 2016 का है, जब महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले स्थित सूरजगढ़ लौह अयस्क खदान से लौह अयस्क ले जा रहे 76 वाहनों को कथित तौर पर प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सदस्यों ने आग के हवाले कर दिया था।
इस मामले की जांच के दौरान सुरेंद्र गाडलिंग पर भी विभिन्न आरोप लगाए गए।
सुरेंद्र गाडलिंग पर क्या आरोप हैं?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, सुरेंद्र गाडलिंग पर आरोप है कि उन्होंने—
- माओवादी संगठन को सहायता प्रदान की,
- सरकार की गतिविधियों और कुछ क्षेत्रों के नक्शे (Maps) कथित रूप से भूमिगत माओवादियों तक पहुंचाए,
- सूरजगढ़ खदान परियोजना का विरोध करने के लिए माओवादियों को प्रोत्साहित किया,
- तथा स्थानीय लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाया।
इन आरोपों के आधार पर उनके विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
भीमा कोरेगांव मामले में भी जेल में हैं गाडलिंग
सुरेंद्र गाडलिंग भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में भी जून 2018 से न्यायिक हिरासत में हैं।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा जांच किए जा रहे इस मामले में उन पर प्रतिबंधित माओवादी संगठन से कथित संबंध रखने और सरकार को अस्थिर करने की साजिश का आरोप है।
सिब्बल ने की थी शीघ्र सुनवाई की मांग
पिछले सप्ताह वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो सुरेंद्र गाडलिंग की ओर से पेश हुए, ने सुप्रीम कोर्ट से मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया था।
उन्होंने अदालत को बताया कि—
- गाडलिंग पिछले साढ़े सात वर्ष से जेल में हैं।
- उनकी जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में नोटिस जारी किया था।
- लेकिन न्यायाधीशों के बार-बार रिक्यूजल के कारण मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी।
अब आगे क्या होगा?
न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर के स्वयं को अलग करने के बाद अब यह मामला नई पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।
नई पीठ ही यह तय करेगी कि सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर आगे सुनवाई कब और किस प्रकार होगी।
मामले का महत्व
यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में रिक्यूजल (Recusal) की अवधारणा और लंबे समय से लंबित जमानत याचिकाओं से जुड़े प्रश्नों को सामने लाता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने गाडलिंग की जमानत पर कोई निर्णय नहीं दिया है और मामला नई पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होने की प्रतीक्षा में है। साथ ही, गाडलिंग के विरुद्ध लगाए गए आरोप अभी न्यायिक विचाराधीन हैं और उन पर अंतिम निर्णय होना शेष है।
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