तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती मामले में कोर्ट ने उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द करने के फैसले को मनमाना बताते हुए राहत प्रदान की
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता। तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती मामले में कोर्ट ने उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द करने के फैसले को मनमाना बताते हुए राहत प्रदान की।
पुलिस भर्ती से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को किसी व्यक्ति के चरित्र या नैतिकता के खिलाफ नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले में यह टिप्पणी करते हुए उम्मीदवार को राहत दी, जिसकी नियुक्ति एक असफल प्रेम संबंध से जुड़े आपराधिक मामले के आधार पर रद्द कर दी गई थी।
अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल करते हुए उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।
क्या था पूरा मामला?
अपीलकर्ता गजुला तिरुपति का चयन स्टाइपेंडियरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल (SCTPC) पद के लिए अस्थायी रूप से किया गया था।
हालांकि बाद में उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई क्योंकि उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था।
यह मामला उसकी पड़ोसी महिला द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि तिरुपति कई वर्षों तक विवाह का वादा कर उसके साथ संबंध में रहा, लेकिन बाद में किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया।
लोक अदालत में हो गया था समझौता
मामले के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और वर्ष 2015 में लोक अदालत के समक्ष आपराधिक कार्यवाही का निस्तारण कर दिया गया।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि तिरुपति ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान अपने सत्यापन (Attestation) फॉर्म में इस मामले की जानकारी स्वयं दी थी। उस पर किसी तथ्य को छिपाने का आरोप नहीं था।
इसके बावजूद भर्ती अधिकारियों ने आरोपों को “नैतिक अधमता” (Moral Turpitude) से जुड़ा मानते हुए उसे पुलिस सेवा के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया।
दोनों वयस्क थे और चार वर्षों तक संबंध में रहे
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता और अपीलकर्ता दोनों वयस्क थे, पड़ोसी थे और लगभग चार वर्षों तक प्रेम संबंध में रहे थे।
अदालत ने यह भी नोट किया कि मामले में बलात्कार का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं था जिससे यह प्रतीत हो कि लोक अदालत में हुआ समझौता किसी दबाव, धमकी या प्रलोभन के कारण कराया गया हो।
“सहमति से बने संबंध आज के समाज में सामान्य हैं”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा:
“विवाह पूर्व संबंध आज के समय में सामान्य बात हैं। दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को मात्र इसी आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के खिलाफ नहीं माना जा सकता। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को अपनी पसंद का संबंध बनाने से रोकता हो।”
अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत संबंधों को केवल इसलिए नैतिक दोष का विषय नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वे विवाह में परिवर्तित नहीं हुए।
हर प्रेम संबंध का अंत विवाह नहीं होता
पीठ ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि हर प्रेम संबंध का अंतिम परिणाम विवाह ही होना चाहिए।
अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि संबंध विवाह तक नहीं पहुंचा, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।
कोर्ट के अनुसार किसी व्यक्ति को विवाह का झूठा आश्वासन देकर संबंध में रखने का प्रश्न सामान्यतः शिकायतकर्ता के साक्ष्य से ही सिद्ध किया जा सकता है। वर्तमान मामले में शिकायतकर्ता स्वयं समझौता कर चुकी थी और उसने आरोपों को आगे नहीं बढ़ाया।
स्क्रीनिंग कमेटी का निर्णय मनमाना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया।
अदालत ने पाया कि उम्मीदवार ने मामले की जानकारी छिपाई नहीं थी और आपराधिक कार्यवाही भी समझौते के माध्यम से समाप्त हो चुकी थी।
ऐसी स्थिति में केवल एक असफल प्रेम संबंध के आधार पर उसे पुलिस सेवा के लिए अयोग्य घोषित करना तर्कसंगत नहीं था।
कोर्ट ने स्क्रीनिंग कमेटी के निर्णय को मनमाना (Arbitrary) करार दिया।
हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश का आदेश बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा पारित उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द किए जाने को सही ठहराया गया था।
साथ ही हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल करते हुए संबंधित अधिकारियों को उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।
फैसले का महत्व
यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और वयस्कों के बीच सहमति पर आधारित संबंधों के संबंध में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के निजी जीवन में बने सहमति-आधारित संबंध, जो किसी अपराध या जबरदस्ती से जुड़े न हों, उन्हें स्वतः “चरित्र दोष” या “नैतिक अधमता” का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
फैसला इस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि हर असफल प्रेम संबंध को धोखाधड़ी या अनैतिक आचरण का मामला नहीं माना जा सकता और सरकारी नियुक्तियों में उम्मीदवारों का मूल्यांकन संवैधानिक मूल्यों तथा वास्तविक तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
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