उच्चतम न्यायलय फैसले के बावजूद सरकार की अनावश्यक अपील से नाराज कोर्ट, लगाया पांच लाख का जुर्माना-

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उच्चतम न्यायलय की पीठ ने कहा कि प्रतिवादी द्वारा पेंशन की पात्रता के संबंध में दायर याचिका पर मामला कोर्ट में समाप्त हो गया था, इस तथ्य के बावजूद राज्य सरकार ने यह तर्क देने का दुस्साहस किया कि प्रतिवादी पेंशन का हकदार नहीं था।

सर्वोच्च अदालत द्वारा तमिलनाडु सरकार की ओर से फैसला दिए जाने के बावजूद एक मामले में ‘अनावश्यक’ अपील दायर किये जाने से सख्त रुख अख्तियार किया है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उस पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने राज्य को सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के साथ चार सप्ताह के भीतर (19 सितंबर से) पांच लाख रुपये जमा करने को कहा है।

उच्चतम अदालत पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि राज्य को इस तरह विशेष अनुमति याचिका दायर नहीं करनी चाहिए। पीठ ने कहा कि प्रतिवादी द्वारा पेंशन की पात्रता के संबंध में दायर याचिका पर मामला कोर्ट में समाप्त हो गया था, इस तथ्य के बावजूद राज्य सरकार ने यह तर्क देने का दुस्साहस किया कि प्रतिवादी पेंशन का हकदार नहीं था।

अदालत ने कहा कि जमा राशि को सुप्रीम कोर्ट की मीडिएशन और कॉन्सिलिएशन प्रोजेक्ट कमेटी को ट्रांसफर की जाए। पीठ ने कहा कि जब इस मामले को अदालत में समाप्त कर दिया गया था कि प्रतिवादी पेंशन का हकदार है तो राज्य के लिए बहस करने का कोई विकल्प खुला नहीं था कि प्रतिवादी पेंशन का हकदार है।

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ज्ञात हो की तमिलनाडु परिवहन विभाग में कंडक्टर के रूप में कार्यरत एक कर्मचारी ने पेंशन पात्रता से जुड़ी याचिका दायर की थी। इस पर शीर्ष अदालत उनकी पेंशन पात्रता की पुष्टि की थी। राज्य सरकार ने उनकी पेंशन का बकाये का भुगतान नहीं किया था और दलील दी थी कि कर्मचारी पेंशन का हकदार नहीं था।

मद्रास उच्च न्यायलय ने भी फरवरी 2022 में राज्य की इस दलील को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रदेश सरकार ने इस मामले के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।