सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘मौत देर से हो तो भी डाइंग डिक्लेरेशन वैध’

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“मरने में देरी से दायर बयान भी वैध”: सुप्रीम कोर्ट ने कहा—डाइंग डिक्लेरेशन समय-गैप से कमजोर नहीं होता, धारा 319 CrPC के तहत अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि डाइंग डिक्लेरेशन केवल इसलिए अविश्वसनीय नहीं हो जाता क्योंकि मौत बाद में हुई। यदि बयान मृत्यु के कारण या उससे जुड़े हालात से संबंधित हो, तो वह धारा 32(1) के तहत पूर्ण साक्ष्य है। कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश पलटते हुए अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने का निर्देश दिया।


सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘मौत देर से हो तो भी डाइंग डिक्लेरेशन वैध

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डाइंग डिक्लेरेशन का मूल्य केवल इस आधार पर कम नहीं होता कि बयान देने के दो महीने बाद मृत्यु हुई
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने स्पष्ट किया—

“धारा 32(1) भारतीय साक्ष्य अधिनियम Indian Evidence Act में मृत्यु और बयान के बीच समय की कोई सीमा नहीं बताई गई है। महत्वपूर्ण यही है कि बयान मृत्यु के कारण या उससे जुड़े परिस्थितियों से संबंधित हो।”

यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट ने धारा 319 CrPC के तहत अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने से संबंधित हाईकोर्ट के आदेश को गलत ठहराया।


मामले की पृष्ठभूमि

  • महिला को गोली लगने से गंभीर चोटें आईं—आरोप पति पर।
  • उसी दिन और बाद में पुलिस ने वीडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से उसके बयान दर्ज किए।
  • बाद में उसने पति के रिश्तेदारों पर उकसाने का आरोप लगाया।
  • दो महीने बाद महिला की मृत्यु हो गई।
  • ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने धारा 319 CrPC के तहत अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने से मना कर दिया।
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अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।


सुप्रीम कोर्ट: महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

🔹 1. डाइंग डिक्लेरेशन पर समय-गैप का कोई प्रभाव नहीं

कोर्ट ने कहा:

“यह आवश्यक नहीं है कि बयान मृत्यु की आशंका में ही दिया जाए। समय-संबंधी कोई बाध्यता कानून में नहीं है।”

🔹 2. मजिस्ट्रेट या डॉक्टर की उपस्थिति जरूरी नहीं

कोर्ट ने कहा कि:

  • मजिस्ट्रेट अनुपस्थित हो सकते हैं,
  • डॉक्टर का ‘फिट टू स्टेटमेंट’ प्रमाण भी आवश्यक नहीं,
  • परंतु अदालत को ऐसे बयानों का मूल्यांकन सावधानी से करना होगा

🔹 3. धारा 319 CrPC—‘वास्तविक अपराधी को न बचने देने की शक्ति’

इस धारा के तहत:

  • सबूत फ्रेमिंग ऑफ चार्ज से उच्च,
  • लेकिन दोषसिद्धि से कम स्तर का होना चाहिए।

PW-2 (नाबालिग बेटी) के बयान में स्पष्ट उकसावे के आरोप थे, जिन्हें इस चरण पर खारिज करना मिनी-ट्रायल जैसा होता—जो कानूनन अनुचित है।

🔹 4. हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट की दृष्टि त्रुटिपूर्ण

कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने—

  • मौत और बयान में समय अंतराल को गलत कारण मानकर बयान को अस्वीकार किया,
  • जबकि यह कानून के विपरीत है,
  • और महत्वपूर्ण सामग्री को नजरअंदाज किया

🔹 5. उत्पीड़न, लड़कियों के जन्म पर नाराज़गी, सेक्स-डिटरमिनेशन जैसे कारक भी प्रासंगिक

कोर्ट ने माना कि:

इन परिस्थितियों ने अतिरिक्त आरोपियों की संलिप्तता का प्रथमदृष्टया संकेत दिया।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने:

  • ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश रद्द किए,
  • अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने का निर्देश दिया,
  • ट्रायल को जल्दी पूरा करने का आदेश दिया।
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सभी लंबित आवेदनों का निस्तारण कर दिया गया।


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