इलाहाबाद HC ने राजस्व अभिलेखों में गलत प्रविष्टि करने पर लेखपाल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर लगाई रोक

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जीवित व्यक्ति को मृत दिखाकर उसके बेटों का नाम राजस्व अभिलेखों में गलत प्रविष्टि के आधार पर दर्ज करने के आरोप में एक लेखपाल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी है।

न्यायमूर्ति संजय कुमार पचौरी की एकल पीठ ने कृष्ण पाल सिंह द्वारा दायर धारा 482 के तहत एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

आईपीसी की धारा 419, 420, 467, 468, 471, पुलिस स्टेशन-फतेहपुर सीकरी, जिला आगरा के तहत आपराधिक मामले की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने के लिए 482 सीआरपीसी आवेदन दायर किया गया है, साथ ही संज्ञान/सम्मन आदेश दिनांक 13.03.2006 लंबित है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, आगरा की अदालत में।

आवेदन दाखिल करने में देरी के बारे में बताया गया है।

आवेदक के वकील ने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दिनांक 3.10.2000 को झूठे और तुच्छ आरोपों के आधार पर गलत इरादे से और केवल आवेदक को परेशान करने के लिए दर्ज की गई है।

आगे यह भी प्रस्तुत किया गया है कि आवेदक के खिलाफ तत्कालीन तहसीलदार द्वारा आक्षेपित प्राथमिकी दर्ज की गई है। एफआईआर के आरोपों के अनुसार आवेदक की फर्जी रिपोर्ट पर विरासत (उत्तराधिकार) आदेश पारित किया गया है।

यह भी कहा गया कि आवेदक हल्का का तत्कालीन लेखपाल था।

आवेदक के वकील ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 197 के तहत बिना किसी मंजूरी के संज्ञान आदेश पारित किया गया है।

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आवेदक के वकील ने आगे कहा कि आवेदक ने अपनी रिपोर्ट राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर प्रस्तुत की है, रिपोर्ट में गलती गांव के ही एक व्यक्ति के दो नामों से संबंधित है। आईपीसी की धारा 419, 420, 467, 468, 471 के तहत दंडनीय अपराध के संबंध में कोई पूर्व-समन साक्ष्य नहीं है।

इस संबंध में आवेदक के वकील ने डी देवराजा बनाम ओवासी सबीर हुसैन, 2020 7 एससीसी 695 में शीर्ष अदालत के फैसले पर भी भरोसा किया है, जिसमें यह माना गया है कि यह कानून का एक मान्यता प्राप्त सिद्धांत है कि मंजूरी एक कानूनी आवश्यकता थी। न्यायालय को संज्ञान लेने का अधिकार देता है।

कोर्ट ने कहा, प्रथम दृष्टया, मामले पर विचार की आवश्यकता है।

कोर्ट ने उत्तरदाताओं को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय और जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। आठ सप्ताह बाद सूची.

अदालत ने आदेश दिया, “अदालत के अगले आदेश तक, आवेदक के खिलाफ उपरोक्त मामले की आगे की कार्यवाही पर रोक रहेगी।”

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