सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को “नेशनल सन” घोषित करने और INA को स्वतंत्रता का श्रेय देने वाली PIL खारिज की; याचिकाकर्ता को चेतावनी।
एक बार फिर जनहित याचिका (PIL) के दायरे को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए Supreme Court of India ने नेताजी Subhas Chandra Bose और Indian National Army से जुड़े दावों वाली याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक समय की बर्बादी हैं।
🔹 क्या थी याचिका
याचिका में मांग की गई थी कि:
- INA को भारत की स्वतंत्रता का श्रेय दिया जाए
- नेताजी को “National Son” घोषित किया जाए
- 21 अक्टूबर 1943 (INA स्थापना दिवस)
- और 23 जनवरी 1897 (जन्मदिन)
को राष्ट्रीय दिवस घोषित किया जाए
🔹 कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा:
- इस तरह के मुद्दे न्यायिक समीक्षा (judicial review) के दायरे में नहीं आते
- इन्हें सरकार के समक्ष उठाया जाना चाहिए
कोर्ट ने यह भी कहा कि:
👉 याचिकाकर्ता पहले भी इसी तरह की याचिका दाखिल कर चुका है, जिसे खारिज किया जा चुका है
🔹 “पब्लिसिटी के लिए याचिका”
सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि:
- बार-बार एक ही मुद्दे पर याचिका दायर करना
- केवल “पब्लिसिटी” हासिल करने का प्रयास प्रतीत होता है
मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी दी:
👉 भविष्य में ऐसी याचिकाओं पर भारी जुर्माना (cost) लगाया जा सकता है
यहां तक कि कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अब आप जाइए, नहीं तो और cost लगा देंगे।”
🔹 रजिस्ट्री को भी निर्देश
अदालत ने अपने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि:
- याचिकाकर्ता द्वारा इसी तरह के मुद्दों पर
- भविष्य में कोई PIL स्वीकार न की जाए
🔹 2022 में भी खारिज हो चुकी थी याचिका
इससे पहले 2022 में भी इसी तरह की याचिका खारिज की गई थी।
तब पीठ में J. D. Y. Chandrachud और जस्टिस J. B. Pardiwala शामिल थे।
कोर्ट ने तब कहा था:
- राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना सरकार का अधिकार है
- अदालत इस प्रकार के नीति-निर्धारण (policy decisions) में हस्तक्षेप नहीं कर सकती
जस्टिस चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी:
👉 “ऐसी याचिकाएं PIL की गरिमा का मजाक बनाती हैं।”
🔹 PIL दुरुपयोग पर चिंता
यह फैसला एक बार फिर दर्शाता है कि:
- सुप्रीम कोर्ट PIL के दुरुपयोग को लेकर सतर्क है
- और गैर-गंभीर याचिकाओं पर सख्त रुख अपना रहा है
🔹 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि:
👉 न्यायालय का मंच ऐतिहासिक मान्यता या राजनीतिक घोषणाओं के लिए नहीं है
ऐसे मुद्दे सरकार और नीति-निर्माताओं के दायरे में आते हैं, न कि न्यायिक हस्तक्षेप के।
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