शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने के आदेश में हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिका वापस लेने की अनुमति

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मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने के आदेश में हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने याचिका वापस ले ली। कोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट में संशोधन (Variation) की मांग करने की स्वतंत्रता दी।


सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ इस मामले में याचिकाकर्ताओं को कोई राहत देने के पक्ष में नहीं थी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी विशेष अनुमति याचिका (SLP) वापस लेने का अनुरोध किया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।


हाईकोर्ट जाने की दी स्वतंत्रता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2 जुलाई के आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता यदि चाहें तो बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष उपयुक्त आवेदन दाखिल कर विवादित आदेश में संशोधन (Variation) की मांग कर सकते हैं।

अदालत ने कहा—

“याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी है। अनुमति प्रदान की जाती है। तदनुसार विशेष अनुमति याचिका वापस ली गई मानते हुए खारिज की जाती है। साथ ही, याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट के समक्ष उपयुक्त आवेदन दाखिल कर विवादित आदेश में संशोधन की मांग करने की स्वतंत्रता दी जाती है।”


याचिकाकर्ताओं की क्या दलील थी?

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने केवल अंतरिम आवेदन (Interim Application) पर सुनवाई करते हुए ही ऐसा आदेश पारित कर दिया, जिससे मामले में अंतिम राहत (Final Relief) प्रदान कर दी गई।

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि से शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने का निर्देश देते हुए कहा था कि प्रतिमा स्थानीय कानूनों का घोर उल्लंघन करते हुए और बिना वैधानिक अनुमति के स्थापित की गई थी।

अदालत ने इसे अवैध निर्माण माना था।


प्रशासन की भूमिका पर भी जताई थी नाराजगी

हाईकोर्ट ने गोवा प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की भी आलोचना की थी।

अदालत ने कहा था कि प्रतिमा बिना कानूनी अनुमति के स्थापित किए जाने के बावजूद संबंधित अधिकारी और प्रशासन ‘मूक दर्शक’ (Mere Bystanders) बने रहे और उन्होंने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।


मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी का क्या आरोप था?

मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी ने हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि उसने बोगदा पुलिस स्टेशन और अन्य संबंधित अधिकारियों के समक्ष कई बार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।

प्राधिकरण का आरोप था कि वास्को-द-गामा स्थित उसकी भूमि पर कुछ स्थानीय लोगों ने कथित रूप से अतिक्रमण कर लिया। यह भी आरोप लगाया गया कि उन्हें स्थानीय विधायक संकल्प आमोनकर, उनकी पत्नी और अन्य स्थानीय पार्षदों का समर्थन प्राप्त था।


कानून-व्यवस्था का हवाला स्वीकार नहीं किया गया

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रशासन लगातार यह कहता रहा कि प्रतिमा हटाने से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है, लेकिन केवल इस आशंका के आधार पर वैधानिक कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता।

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अदालत ने माना कि अधिकारियों ने इस आधार पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।


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