दहेज मृत्यु मामलों में 99.61% जमानत: इलाहाबाद हाईकोर्ट जज के आदेशों पर उठे सवाल

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अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच दहेज मृत्यु से जुड़े 510 जमानत मामलों में से 508 में राहत दी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया द्वारा दहेज मृत्यु मामलों में 99% जमानत देने के आंकड़ों ने बहस छेड़ी, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद मामला चर्चा में।


प्रयागराज: दहेज मृत्यु Dowry Death जैसे गंभीर अपराधों में जमानत देने के पैटर्न को लेकर Allahabad High Court के एक न्यायाधीश के आदेशों ने न्यायिक विमर्श को तेज कर दिया है। हालिया विश्लेषण में सामने आया है न्यायमूर्ति Pankaj Bhatia ने अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच दहेज मृत्यु से जुड़े 510 जमानत मामलों में से 508 में राहत दी—यानी करीब 99.61% मामलों में जमानत मंजूर की गई।

यह मामला उस समय और चर्चा में आ गया जब Supreme Court of India ने उनके एक जमानत आदेश को “चौंकाने वाला और निराशाजनक” बताते हुए रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति J B Pardiwala और न्यायमूर्ति K V Vishwanathan की पीठ ने टिप्पणी की कि आदेश पढ़कर यह समझना मुश्किल है कि हाईकोर्ट ने जमानत देने का विवेक किन आधारों पर प्रयोग किया।

सुप्रीम कोर्ट ने जिस मामले में हस्तक्षेप किया, वह श्रावस्ती की 28 वर्षीय महिला की संदिग्ध मौत से जुड़ा था, जिसकी शादी के कुछ ही महीनों बाद मृत्यु हो गई थी। पोस्टमॉर्टम में मौत का कारण गला दबाना बताया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को अपराध की प्रकृति, सजा, संबंध, घटनास्थल और चिकित्सीय साक्ष्यों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इस फटकार के कुछ दिनों बाद न्यायमूर्ति भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि उन्हें जमानत मामलों की सूची (बेल रोस्टर) न सौंपी जाए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर “गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव” पड़ा है।

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क्या कहते हैं आंकड़े?

विश्लेषण के अनुसार, इन 510 मामलों में अधिकांश आरोप Section 304B IPC (या Bharatiya Nyaya Sanhita की समकक्ष धारा) और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत थे। इनमें 362 आरोपी पति, 68 सास, 63 ससुर और अन्य रिश्तेदार शामिल थे।

मौत के कारणों में सबसे अधिक मामले फांसी (340) के थे, जबकि जहर, गला दबाना, जलाना और अन्य कारण भी सामने आए। अधिकांश मामलों में अदालत ने यह नोट किया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह अपेक्षाकृत कम समय से जेल में है।

करीब आधे मामलों (253) में अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि “मृत्यु से ठीक पहले दहेज के लिए उत्पीड़न” हुआ था—जो दहेज मृत्यु के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी तत्व है।

आदेशों की समान भाषा पर सवाल

इन जमानत आदेशों की भाषा और संरचना में उल्लेखनीय समानता देखी गई। अधिकांश आदेशों में एक जैसी पंक्तियां दोहराई गईं—जैसे “रिकॉर्ड पर कुछ नहीं है”, “विशिष्ट आरोप नहीं हैं” या “आरोपी का आपराधिक इतिहास नहीं है”।

जमानत की शर्तें भी लगभग समान रहीं—₹20,000 के निजी मुचलके और दो जमानतदारों के साथ रिहाई, साथ ही अदालत में उपस्थित रहने और गवाहों को प्रभावित न करने की शर्त।

हालांकि कुछ मामलों में अदालत ने अतिरिक्त तथ्यों—जैसे मृत्युपूर्व बयान या गवाहों के बयान—का उल्लेख किया, लेकिन आदेशों का मूल ढांचा लगभग एक जैसा रहा।

कहां नहीं मिली जमानत?

510 मामलों में केवल दो मामलों में जमानत खारिज की गई। इनमें एक मामले में पीड़िता को 90% जलने की चोटें थीं और उसने घटना के दिन अपने पिता को प्रताड़ना की जानकारी दी थी। दूसरे मामले में गोली लगने से मौत का आरोप था, जहां अदालत ने हत्या के स्पष्ट आरोप और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर जमानत देने से इनकार किया।

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कानूनी बहस तेज

दहेज मृत्यु कानून के तहत, यदि विवाह के सात साल के भीतर महिला की असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और उत्पीड़न के साक्ष्य मिलते हैं, तो कानून आरोपी के खिलाफ एक धारणा (presumption) बनाता है। ऐसे में जमानत पर निर्णय अत्यंत सावधानी से लिया जाना अपेक्षित होता है।

इस परिप्रेक्ष्य में, इतने बड़े पैमाने पर जमानत दिए जाने और आदेशों की समानता ने न्यायिक विवेक, मानक और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है।


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