‘न्यायिक सक्रियता में हमेशा न्यायिक संयम का संतुलन होना चाहिए’: CJI

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स्वीडन सम्मेलन में CJI सूर्य कांत ने बताया भारतीय न्यायपालिका का संवैधानिक दृष्टिकोण

स्वीडन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए CJI सूर्य कांत ने न्यायिक समीक्षा, मूल ढांचा सिद्धांत, कॉलेजियम प्रणाली, जनहित याचिका, पर्यावरण न्यायशास्त्र और कानून के शासन पर भारतीय न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित किया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने कहा कि न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का प्रयोग हमेशा न्यायिक संयम (Judicial Restraint) के साथ संतुलित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का दायित्व संविधान की रक्षा करना है, लेकिन उसे अपनी संस्थागत सीमाओं का भी सम्मान करना चाहिए और शासन के अन्य अंगों के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

CJI स्वीडन में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (IDEA) द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में “Safeguarding the Rule of Law: Experiences from India and Sweden” विषय पर संबोधित कर रहे थे।

मूल ढांचा सिद्धांत को बताया भारतीय न्यायपालिका का ऐतिहासिक योगदान

CJI ने कहा कि केशवानंद भारती निर्णय से विकसित मूल ढांचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक है।

उन्होंने कहा कि इस सिद्धांत ने स्थापित किया कि संविधान की एक मूल पहचान (Basic Identity) है, जिसे संसद संवैधानिक संशोधन के माध्यम से भी समाप्त नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers) भी संविधान के इसी मूल ढांचे का अभिन्न हिस्सा है और इसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

कॉलेजियम प्रणाली के विकास का किया उल्लेख

मुख्य न्यायाधीश ने न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी कॉलेजियम प्रणाली के विकास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समय के साथ विकसित इस व्यवस्था ने न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

जनहित याचिका ने न्याय तक पहुंच का विस्तार किया

CJI ने एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (SP Gupta Case) का उल्लेख करते हुए कहा कि जनहित याचिका (PIL) ने भारतीय न्यायपालिका को सामाजिक न्याय के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर दिया। उन्होंने कहा कि PIL के माध्यम से न्याय तक पहुंच का दायरा व्यापक हुआ और वंचित वर्गों को भी संवैधानिक संरक्षण उपलब्ध हुआ।

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न्यायिक समीक्षा संवैधानिक शक्ति ही नहीं, संवैधानिक कर्तव्य भी

CJI ने कहा कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) केवल न्यायपालिका की संवैधानिक शक्ति नहीं, बल्कि उसका संवैधानिक दायित्व भी है।

उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने यह सुनिश्चित किया है कि ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) केवल संविधान का सैद्धांतिक वादा बनकर न रह जाए, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए व्यवहारिक और प्रभावी वास्तविकता बने।

अदालतें ‘सुपर-एग्जीक्यूटिव’ नहीं हैं

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा यह स्वीकार किया है कि कानून का शासन तभी प्रभावी रह सकता है, जब न्यायपालिका अपनी संस्थागत सीमाओं का सम्मान करे और शासन के अन्य अंगों को भी उनके संवैधानिक दायरे में कार्य करने के लिए प्रेरित करे।

उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायालय राज्य के अन्य अंगों द्वारा लिए गए जटिल तकनीकी अथवा सामाजिक-आर्थिक निर्णयों में दूसरी अपीलीय प्राधिकरण (Second Appellate Authority) या सुपर-एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य नहीं करता।

पर्यावरण न्यायशास्त्र में भारतीय न्यायपालिका के योगदान का उल्लेख

CJI ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारतीय न्यायपालिका द्वारा विकसित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पूर्ण दायित्व (Absolute Liability), प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle), एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle) तथा पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत (Public Trust Doctrine) जैसे सिद्धांतों ने पर्यावरण न्यायशास्त्र को नई दिशा दी है।

चुनावी लोकतंत्र को मजबूत करने वाले फैसलों का किया जिक्र

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूचना प्रकटीकरण (Voter Disclosure) और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा मानने जैसे निर्णयों के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत किया है।

जेंडर जस्टिस पर भी रखे विचार

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका ने लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए भी कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं।

उन्होंने बार काउंसिलों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने संबंधी हालिया निर्देशों, विशाखा दिशानिर्देश (Vishaka Guidelines) तथा महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) को मान्यता देने वाले निर्णयों का उल्लेख किया।

महाभारत के प्रसंग से समझाया न्यायिक निष्पक्षता का महत्व

अपने संबोधन में CJI ने महाभारत के राजा प्रह्लाद, उनके पुत्र विरोचन और विद्वान सुधन्वा से जुड़े प्रसंग का उल्लेख किया।

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उन्होंने कहा कि इस कथा में राजा प्रह्लाद ने अपने पुत्र के बजाय सत्य और न्याय के पक्ष में निर्णय दिया। इससे यह संदेश मिलता है कि न्यायाधीश को व्यक्तिगत, राजनीतिक अथवा वंशवादी प्रभावों से ऊपर उठकर केवल न्याय और सत्य के आधार पर निर्णय देना चाहिए।

अदालतें केवल तमाशबीन नहीं रह सकतीं

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान के अंतर्गत न्यायालयों की भूमिका केवल दर्शक की नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को संविधान की सर्वोच्चता का सतर्क प्रहरी बने रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक शक्ति का प्रत्येक प्रयोग संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही हो।

उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक संस्थाएं अपनी निर्धारित सीमाओं से विचलित होती हैं, तब न्यायिक समीक्षा एक सुधारात्मक संवैधानिक तंत्र के रूप में कार्य करती है।

कानून का शासन केवल पश्चिमी अवधारणा नहीं

CJI सूर्य कांत ने उस धारणा को भी अस्वीकार किया कि कानून का शासन (Rule of Law) और न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल पश्चिमी या उपनिवेशोत्तर अवधारणाएं हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय दार्शनिक परंपरा में ‘धर्म’ को व्यक्तिगत अथवा वंशवादी सत्ता से ऊपर माना गया है और यह सिद्धांत हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता का अभिन्न हिस्सा रहा है। उनके अनुसार संस्थागत ईमानदारी और न्याय की अवधारणा भारतीय चिंतन में कॉमन लॉ परंपरा से भी पहले से विद्यमान रही है।


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