गैंगरेप में हर मामले में उम्रकैद नहीं; सजा अपराध और परिस्थितियों के अनुपात में होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट गैंगरेप सजा 20 साल

सुप्रीम कोर्ट ने गैंगरेप के दोषी की सजा में संशोधन करते हुए प्राकृतिक जीवनभर की कैद को 20 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। अदालत ने कहा कि सजा अपराध की गंभीरता और दोषी की परिस्थितियों के बीच संतुलित एवं अनुपातिक (Proportionate) होनी चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने गैंगरेप के एक दोषी की सजा में संशोधन करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376-डी के तहत हर दोषसिद्धि में प्राकृतिक जीवन (Natural Life) के शेष समय तक कारावास देना अनिवार्य नहीं है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने कहा कि सजा निर्धारित करते समय “अनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality)” का पालन किया जाना चाहिए, ताकि पीड़िता, समाज और आरोपी—तीनों के हितों के बीच न्यायसंगत संतुलन बनाया जा सके।

अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए दोषी की सजा प्राकृतिक जीवनभर के कारावास से घटाकर 20 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दी। साथ ही कहा कि यदि कानून के अनुसार पात्रता हो तो दोषी को रिमिशन (Remission) का लाभ भी मिल सकेगा।


क्या था मामला?

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता देर रात दिल्ली रेलवे स्टेशन से घर जाने के लिए एक रिक्शे में बैठी थी। रिक्शा चालक ने उसे घर छोड़ने का भरोसा दिया, लेकिन वह उसे सुनसान स्थान पर ले गया, जहां उसका एक साथी भी पहुंच गया।

दोनों आरोपियों ने मिलकर पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) किया।


निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने अपराध की गंभीरता और पीड़िता के साथ हुई बर्बरता को देखते हुए दोनों आरोपियों को—

  • प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक कठोर कारावास तथा
  • ₹25,000 जुर्माना (जो पीड़िता को दिया जाना था)

की सजा सुनाई थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि और सजा दोनों को बरकरार रखा।


सुप्रीम कोर्ट में क्या मुद्दा था?

सुप्रीम कोर्ट में आरोपी ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी।

उसने केवल यह तर्क दिया कि—

  • प्राकृतिक जीवनभर की कैद अत्यधिक कठोर है।
  • उसकी सजा को अनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत के आधार पर कम किया जाना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट ने सजा पर क्या सिद्धांत बताए?

अदालत ने कहा कि सजा निर्धारित करते समय केवल अपराध की गंभीरता ही नहीं, बल्कि आरोपी से जुड़ी परिस्थितियों का भी समुचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, सजा तय करते समय निम्नलिखित पहलुओं पर विचार आवश्यक है—

  • अपराध की प्रकृति और गंभीरता।
  • समाज पर उसका प्रभाव।
  • निवारक (Deterrent) प्रभाव।
  • आरोपी का उद्देश्य और आचरण।
  • अपराध पूर्व नियोजित था या नहीं।
  • आरोपी की आयु।
  • उसका आपराधिक इतिहास।
  • पीड़ितों की संख्या।
  • सुधार (Reformation) की संभावना।
  • विश्वास के दुरुपयोग या विशेष संबंधों का पहलू।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सूची उदाहरणात्मक (Illustrative) है, अंतिम नहीं।


दोषी के पक्ष में किन परिस्थितियों पर विचार किया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित परिस्थितियों को आरोपी के पक्ष में महत्वपूर्ण माना—

  • घटना के समय उसकी आयु केवल 25 वर्ष थी।
  • उसके विरुद्ध कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।
  • राज्य यह साबित नहीं कर सका कि उसके सुधार की कोई संभावना नहीं है।
  • लगभग 10 वर्षों की जेल अवधि में उसका आचरण संतोषजनक रहा, जिसे राज्य ने भी विवादित नहीं किया।

फिर भी अदालत ने अपराध की गंभीरता पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

गैंगरेप केवल पीड़िता के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरे समाज के विरुद्ध अपराध है।

अदालत ने कहा कि निर्भया कांड के बाद कानून में सख्त संशोधन किए गए, लेकिन इसके बावजूद यौन अपराध लगातार हो रहे हैं। इसलिए ऐसे अपराधों के प्रति न्यायपालिका का दृष्टिकोण कठोर होना चाहिए।

कोर्ट ने सज़ा तय करने के सिद्धांतों पर चर्चा की। ‘बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य’ (1982) मामले में जस्टिस पी.एन. भगवती की असहमति वाली राय का ज़िक्र करते हुए, कोर्ट ने फिर से कहा कि “दी गई सज़ा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए” और आनुपातिकता (proportionality) को एक अहम संवैधानिक सिद्धांत माना।

‘सुरिंदर सिंह बनाम राज्य (चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश)’ (2021) मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि आनुपातिकता के लिए अपराध की गंभीरता, अपराधी के व्यवहार और आपराधिक न्याय के उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है। हालाँकि सज़ा में जनता की नाराज़गी साफ़ तौर पर दिखनी चाहिए, लेकिन न्यायिक विवेक का इस्तेमाल मनमाने ढंग से या अप्रासंगिक बातों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

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धारा 376-डी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के बाद धारा 376-डी के तहत—

  • 20 वर्ष का कठोर कारावास न्यूनतम अनिवार्य सजा है।
  • उपयुक्त मामलों में अदालत प्राकृतिक जीवन तक कारावास की सजा भी दे सकती है।

हालांकि, कानून यह नहीं कहता कि हर गैंगरेप के मामले में प्राकृतिक जीवनभर की कैद ही दी जाए।


सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने—

  • गैंगरेप की दोषसिद्धि बरकरार रखी।
  • प्राकृतिक जीवनभर की कैद को 20 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया।
  • कानून के अनुसार पात्रता होने पर रिमिशन का लाभ देने की भी अनुमति दी।

फैसले का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि कठोरतम सजा भी प्रत्येक मामले में स्वतः लागू नहीं होती। अदालतों को अपराध की गंभीरता के साथ-साथ आरोपी की आयु, आपराधिक पृष्ठभूमि, जेल में आचरण और सुधार की संभावना जैसे पहलुओं का भी संतुलित मूल्यांकन करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप पीड़ित, समाज और आरोपी—तीनों के हितों के बीच उचित संतुलन स्थापित करना भी है।


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