वाहन की अवैध जब्ती मौलिक अधिकारों का उल्लंघन, वाहन मालिक को ₹25 हजार प्रतिमाह मुआवजा – HC

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गोवध कानून में अवैध वाहन जब्ती पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, मालिक को मुआवजे का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम के तहत वाहन की अवैध जब्ती को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। कोर्ट ने गाजीपुर डीएम और वाराणसी कमिश्नर के आदेश रद्द करते हुए वाहन मालिक को ₹25 हजार प्रतिमाह मुआवजा देने का निर्देश दिया।

Allahabad High Court ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम के तहत वाहन की अवैध जब्ती को नागरिक के मौलिक और संपत्ति अधिकारों का गंभीर उल्लंघन करार देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने Ghazipur के जिलाधिकारी और Varanasi मंडल के कमिश्नर द्वारा पारित जब्ती आदेशों को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वाहन मालिक को मार्च 2025 से वाहन वापस सौंपे जाने तक ₹25 हजार प्रति माह की दर से मुआवजा दिया जाए।

क्या है पूरा मामला?

मामला Ashish Kumar Kannaujia की याचिका से जुड़ा है। याची का वाहन मार्च 2025 में नोनहरा थाना पुलिस ने गश्त के दौरान प्रतिबंधित पशु ले जाने के संदेह में पकड़ लिया था।

इसके बाद Ghazipur के जिलाधिकारी ने सितंबर 2025 में वाहन जब्ती का आदेश जारी कर दिया। बाद में फरवरी 2026 में Varanasi मंडल के कमिश्नर ने भी डीएम के आदेश को सही ठहराया।

इन दोनों आदेशों को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस Sandeep Jain की एकल पीठ ने कहा कि Uttar Pradesh Prevention of Cow Slaughter Act के तहत राज्य के भीतर गोवंश परिवहन पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है और इसके लिए किसी परमिट की भी आवश्यकता नहीं है।

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अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल आशंका या संदेह के आधार पर किसी नागरिक की संपत्ति जब्त नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई के कारण याची अपने आजीविका के साधन से वंचित हो गया, जो संविधान के तहत संरक्षित संपत्ति अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

‘कानून का दुरुपयोग’ — याची की दलील

याची की ओर से अधिवक्ता Praveen Kumar Singh ने अदालत में तर्क दिया कि वर्तमान समय में Uttar Pradesh Prevention of Cow Slaughter Act का व्यापक दुरुपयोग हो रहा है।

उन्होंने कहा कि राज्य के भीतर पशुओं के परिवहन के लिए किसी प्रकार के परमिट की जरूरत नहीं है, इसलिए वाहन जब्ती का आदेश पूरी तरह अवैध और मनमाना है।

अदालत ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून की गलत व्याख्या करते हुए कार्रवाई की।

मुआवजे का आदेश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वाहन मालिक को मार्च 2025 से वाहन की वापसी तक ₹25 हजार प्रतिमाह के हिसाब से मुआवजा दिया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि राज्य सरकार उचित समझे, तो यह राशि उन अधिकारियों से वसूल सकती है जिन्होंने कानून की अनदेखी करते हुए अवैध आदेश पारित किए।

संपत्ति अधिकार पर अहम टिप्पणी

फैसले में अदालत ने दोहराया कि यद्यपि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन यह अब भी संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण प्राप्त अधिकार है।

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कोर्ट ने कहा कि किसी नागरिक को बिना वैधानिक आधार के उसके वाहन और आजीविका से वंचित करना संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

प्रशासनिक कार्रवाई पर उठे सवाल

यह फैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में गोवध निवारण कानून के तहत वाहन जब्ती और पशु परिवहन से जुड़े मामलों पर लगातार बहस हो रही है।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को प्रशासनिक अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है कि कानून लागू करते समय वैधानिक सीमाओं और नागरिक अधिकारों का ध्यान रखना अनिवार्य है।

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