Hindu Succession Act, 1956 के तहत यदि किसी महिला की बिना वसीयत मृत्यु होती है, तो उसकी संपत्ति पहले उसकी संतान और पति को जाती है
- पत्नी की मृत्यु होने पर बकाया समझौता राशि किसका?
- तलाक की डिक्री पारित हो चुकी थी, जिससे पति का कानूनी दर्जा समाप्त हो गया
- मृतका की मां, एक कानूनी प्रतिनिधि के रूप में
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक के बाद पत्नी की मृत्यु होने पर बकाया समझौता राशि उसकी मां को मिलेगी, पति का दावा खारिज।
हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
Allahabad High Court ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि आपसी सहमति से तलाक की डिक्री पारित होने के बाद, लेकिन समझौता राशि प्राप्त होने से पहले पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो उस राशि पर उसका कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में उसकी मां को वैध उत्तराधिकारी माना जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मृतका की मां किरन रायकवार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। पति-पत्नी के बीच आपसी सहमति से तलाक हुआ था, जिसमें समझौते के तहत पत्नी को कुल 20 लाख रुपये दिए जाने थे। इसमें से 4 लाख रुपये का भुगतान पहले ही किया जा चुका था, जबकि शेष 16 लाख रुपये का भुगतान होना बाकी था।
भुगतान से पहले हुई पत्नी की मृत्यु
रिकॉर्ड के अनुसार, शेष राशि का चेक तैयार होने से ठीक पहले महिला की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी मां ने फैमिली कोर्ट, बांदा में लंबित 16 लाख रुपये की राशि पर दावा किया।
जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की पीठ का निर्णय
न्यायमूर्ति Kshitij Shailendra की एकल पीठ ने इस मामले में विस्तृत सुनवाई के बाद मां के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि यह राशि मृतका की संपत्ति का हिस्सा है।
हिंदू उत्तराधिकार कानून का विश्लेषण
अदालत ने Hindu Succession Act, 1956 की धारा 14 और 15 का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी हिंदू महिला को प्राप्त संपत्ति—चाहे वह गुजारा भत्ता हो या न्यायालय की डिक्री के तहत मिले—उसकी “पूर्ण संपत्ति” होती है, न कि सीमित अधिकार।
पति का दावा क्यों खारिज हुआ
पति की ओर से यह तर्क दिया गया कि यह राशि केवल पत्नी के भरण-पोषण के लिए थी और उसकी मृत्यु के बाद यह किसी अन्य को नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा कि तलाक की डिक्री पारित हो चुकी थी, जिससे पति का कानूनी दर्जा समाप्त हो गया था।
उत्तराधिकार के नियमों का अनुप्रयोग
अदालत ने कहा कि Hindu Succession Act, 1956 के तहत यदि किसी महिला की बिना वसीयत मृत्यु होती है, तो उसकी संपत्ति पहले उसकी संतान और पति को जाती है। लेकिन इस मामले में न तो पति का वैवाहिक दर्जा शेष था और न ही कोई संतान थी, इसलिए संपत्ति का अधिकार माता-पिता को जाएगा।
कानूनी प्रतिनिधि के अधिकार को मान्यता
कोर्ट ने यह भी कहा कि Code of Civil Procedure, 1908 के तहत मृतका की मां, एक कानूनी प्रतिनिधि के रूप में, इस राशि को प्राप्त करने की पूर्ण हकदार है। इस प्रकार, लंबित समझौता राशि मृतका की संपदा का हिस्सा मानी गई।
दो सप्ताह में भुगतान का निर्देश
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट, बांदा के प्रिंसिपल जज को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर 16 लाख रुपये की राशि याचिकाकर्ता (मृतका की मां) को जारी करें।
फैसले का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय पारिवारिक कानून और उत्तराधिकार कानून के संगम पर एक महत्वपूर्ण नजीर स्थापित करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के बाद भी महिला के वित्तीय अधिकार सुरक्षित रहते हैं और उनकी मृत्यु के बाद ये अधिकार उसके वैध उत्तराधिकारियों को स्थानांतरित होते हैं।
निष्कर्ष
यह फैसला उन मामलों में मार्गदर्शक साबित होगा, जहां तलाक के बाद वित्तीय समझौतों का भुगतान लंबित रहता है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि ऐसी राशि को केवल “भरण-पोषण” के संकीर्ण दायरे में नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे महिला की संपत्ति के रूप में मान्यता दी जाएगी।
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