“फाइनेंस चार्ज” और “ब्याज” अलग-अलग अवधारणाएं
सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BMRCL) की याचिका खारिज करते हुए नवयुगा इंजीनियरिंग कंपनी के पक्ष में ₹122.76 करोड़ का आर्बिट्रेशन अवॉर्ड बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रल अवॉर्ड में सीमित न्यायिक हस्तक्षेप ही संभव है।
Supreme Court of India ने बेंगलुरु मेट्रो परियोजना से जुड़े बहुचर्चित आर्बिट्रेशन विवाद में Navayuga Engineering Company के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए ₹122.76 करोड़ का आर्बिट्रेशन अवॉर्ड बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने Bengaluru Metro Rail Corporation Limited (BMRCL) की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए कहा कि कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई उचित आधार नहीं बनता।
जस्टिस Sanjay Kumar और जस्टिस K. Vinod Chandran की खंडपीठ ने 29 नवंबर 2024 के अंतरिम आदेश को भी निरस्त कर दिया।
क्या है पूरा विवाद?
मामला Navayuga Engineering Company को बेंगलुरु में एलिवेटेड मेट्रो संरचनाओं के निर्माण का ठेका दिए जाने से जुड़ा है। परियोजना के दौरान देरी और अतिरिक्त खर्च को लेकर कंपनी और Bengaluru Metro Rail Corporation Limited के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।
नवयुगा ने दावा किया कि परियोजना में हुई देरी BMRCL की वजह से हुई, जिसके कारण उसे अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ा। मामला तीन सदस्यीय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के पास गया।
आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने क्या फैसला दिया?
16 अगस्त 2018 को ट्रिब्यूनल ने नवयुगा के पक्ष में ₹122.76 करोड़ का अवॉर्ड पारित किया। इसके साथ 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देने का निर्देश दिया गया।
अवॉर्ड में क्लेम 8 से 10 के तहत देरी के कारण हुए अतिरिक्त खर्च और फाइनेंस चार्ज शामिल थे। इनमें लगभग ₹56.23 करोड़ मूल राशि और ₹40.01 करोड़ वित्तीय शुल्क (Finance Charges) के रूप में दिए गए थे।
कमर्शियल कोर्ट ने आंशिक राहत दी थी
Bengaluru Metro Rail Corporation Limited ने आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत बेंगलुरु की कमर्शियल कोर्ट में चुनौती दी।
28 जनवरी 2022 को कमर्शियल कोर्ट ने अधिकांश अवॉर्ड को बरकरार रखा, लेकिन फाइनेंस चार्ज वाले हिस्से को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि यह भारतीय कानून की मूल नीति के खिलाफ और “पेटेंट इलिगैलिटी” से ग्रस्त है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने पूरा अवॉर्ड बहाल किया
इसके बाद Navayuga Engineering Company ने Karnataka High Court में अपील दायर की।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 34 और 37 के तहत अदालतों का दायरा बेहद सीमित है और वे आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा किए गए तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकतीं।
अदालत ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में अदालतों में आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को तथ्यों की दोबारा समीक्षा कर रद्द करने की “चिंताजनक प्रवृत्ति” बढ़ी है, जो आर्बिट्रेशन कानून की मूल भावना के विपरीत है।
‘फाइनेंस चार्ज’ और ‘ब्याज’ में अंतर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “फाइनेंस चार्ज” और “ब्याज” अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
कोर्ट के अनुसार, फाइनेंस चार्ज वह वास्तविक वित्तीय बोझ है जो परियोजना में देरी के कारण ठेकेदार को उठाना पड़ा। चूंकि ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर यह राशि निर्धारित की थी, इसलिए इसमें हस्तक्षेप उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे वित्तीय नुकसान की भरपाई से इनकार करना निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए Bengaluru Metro Rail Corporation Limited ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
हालांकि शीर्ष अदालत ने संक्षिप्त आदेश में कहा कि मामले में हस्तक्षेप का कोई उचित कारण नहीं है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी और हाईकोर्ट द्वारा बहाल किया गया पूरा आर्बिट्रल अवॉर्ड कायम रखा।
आर्बिट्रेशन मामलों में महत्वपूर्ण फैसला
यह फैसला आर्बिट्रेशन कानून के तहत न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को दोबारा स्पष्ट करता है। अदालतों ने एक बार फिर कहा है कि जब तक आर्बिट्रल अवॉर्ड सार्वजनिक नीति के खिलाफ या स्पष्ट रूप से अवैध न हो, तब तक अदालतों को उसमें हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
यह निर्णय इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी ठेकों से जुड़े आर्बिट्रेशन विवादों में भविष्य के मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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