इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को पति की आय का 25% तक भरण-पोषण मिल सकता है। कोर्ट ने ₹500 से ₹3000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता बढ़ाने के आदेश को सही ठहराया।
प्रयागराज | कानूनी संवाददाता
पत्नी को पति की आय का 25% तक भरण-पोषण का अधिकार: गुजारा भत्ता बढ़ाने के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की मुहर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी को पति की आय का लगभग 25 प्रतिशत तक गुजारा भत्ता (Maintenance) दिए जाने को कानूनन उचित माना जा सकता है। कोर्ट ने परिवार न्यायालय द्वारा पत्नी के भरण-पोषण की राशि बढ़ाने के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि बदलते आर्थिक हालात और महंगाई के दौर में न्यूनतम सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना पति का कानूनी और नैतिक दायित्व है।
यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश चंद्र द्वारा दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर पारित किया। याचिका में अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, शाहजहांपुर के 26 जुलाई 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें पत्नी को दिए जाने वाले मासिक भरण-पोषण को ₹500 से बढ़ाकर ₹3000 प्रतिमाह कर दिया गया था।
क्या था मामला?
मामले के अनुसार, पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 127 के तहत भरण-पोषण की राशि बढ़ाने की मांग की थी। परिवार न्यायालय ने यह मानते हुए कि पहले दी जा रही राशि अपर्याप्त है, गुजारा भत्ता बढ़ाने का आदेश पारित किया।
इस आदेश को पति सुरेश चंद्र ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि—
- वह एक मजदूर है
- सीमित आय में मुश्किल से जीवन यापन कर पा रहा है
- भरण-पोषण की राशि पहले ही कई बार (छठी बार) बढ़ाई जा चुकी है
- निचली अदालत ने सभी तथ्यों पर समुचित विचार नहीं किया
राज्य का पक्ष: ₹3000 न तो ज्यादा है, न ही असंगत
राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी अधिवक्ता ने पति की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि—
- वर्तमान महंगाई के दौर में ₹3000 प्रतिमाह कोई बड़ी राशि नहीं है
- यह राशि पति की संभावित आय से परे नहीं है
- पत्नी स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
अदालत ने अभिलेखों का अवलोकन करते हुए माना कि—
- पत्नी, पुनरीक्षणकर्ता की विधिवत विवाहित पत्नी है
- वह स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है
- पति का यह तर्क कि वह केवल मजदूर है, उसे भरण-पोषण से मुक्त नहीं करता
न्यायालय ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि यदि पति मजदूरी करता है, तो वह औसतन ₹600 प्रतिदिन कमा सकता है। इस आधार पर उसकी अनुमानित मासिक आय लगभग ₹18,000 बैठती है। ऐसे में ₹3000 प्रतिमाह का भरण-पोषण न तो असंगत है और न ही अत्यधिक।
कोर्ट ने दो टूक कहा कि—
“पत्नी का भरण-पोषण करना पति का केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व भी है।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के तीन महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया—
- रजनेश बनाम नेहा
- कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी
- कुलभूषण कुमार बनाम राज कुमारी
इन फैसलों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की आय का लगभग 25 प्रतिशत तक देना एक स्वीकृत और संतुलित मानक है, जिससे पति पर असहनीय बोझ नहीं पड़ता और पत्नी को न्यूनतम गरिमापूर्ण जीवन मिल सके।
पुनरीक्षण याचिका खारिज
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर हाईकोर्ट ने—
- परिवार न्यायालय के आदेश को कानूनसम्मत माना
- पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया
अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि बढ़ाने में कोई कानूनी त्रुटि या मनमानी नहीं है।
क्यों अहम है यह फैसला?
- यह फैसला पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को मजबूती देता है
- मजदूर या कम आय का तर्क देकर पति भरण-पोषण से बच नहीं सकता
- अदालतों के लिए 25% आय का मानक एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में फिर से रेखांकित हुआ
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