विवाह से पहले सहमति से बने संबंध को चरित्र पर दाग नहीं माना जा सकता: पुलिस भर्ती रद्द करना मनमाना, सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवार को दी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना प्री-मैरिटल संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र पर प्रतिकूल टिप्पणी का आधार नहीं हो सकता। तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े मामले में कोर्ट ने भर्ती रद्द करने के आदेश को मनमाना बताते हुए उम्मीदवार को राहत दी।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना शारीरिक या प्रेम संबंध अपने आप में किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि आज के समय में विवाह-पूर्व संबंध सामान्य सामाजिक वास्तविकता हैं और केवल इस वजह से किसी व्यक्ति को नैतिक रूप से दोषी नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने तेलंगाना राज्य द्वारा एक उम्मीदवार की अस्थायी नियुक्ति रद्द करने के निर्णय को मनमाना करार देते हुए उसे राहत प्रदान की।
मामला क्या था?
अपीलकर्ता का चयन स्टाइपेंडियरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल (SCTPC) पद के लिए अस्थायी रूप से हुआ था, जो उसके चरित्र एवं पृष्ठभूमि सत्यापन के अधीन था।
भर्ती प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवार ने अपने सत्यापन फॉर्म में यह जानकारी स्वयं दी थी कि उसके खिलाफ पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 417, 420 और 506 सहपठित धारा 34 के तहत एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था।
यह मामला उसकी पड़ोस में रहने वाली युवती की शिकायत पर दर्ज हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि दोनों के बीच कई वर्षों तक प्रेम संबंध रहा और विवाह का आश्वासन दिया गया था, लेकिन बाद में युवक ने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया।
लोक अदालत में समझौते के बाद मामला समाप्त
बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और वर्ष 2015 में लोक अदालत के समक्ष मामला सुलझा लिया गया। इसके बाद आपराधिक कार्यवाही का विधिवत निस्तारण हो गया।
उम्मीदवार ने भर्ती अधिकारियों को बताया कि मामला समझौते के आधार पर समाप्त हो चुका है और उसने किसी तथ्य को छिपाया भी नहीं है। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड ने यह कहते हुए उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी कि मामला “नैतिक अधमता” (Moral Turpitude) से जुड़ा है और वह पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
उम्मीदवार ने भर्ती रद्द किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
एकल पीठ ने उसकी याचिका स्वीकार करते हुए अधिकारियों को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। हालांकि, बाद में खंडपीठ ने यह कहते हुए एकल पीठ का आदेश रद्द कर दिया कि किसी उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है और अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इसके बाद उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि किसी उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामले की जानकारी ईमानदारी से देने के बावजूद नियोक्ता उसकी उपयुक्तता का स्वतंत्र आकलन कर सकता है। लेकिन ऐसा निर्णय मनमाना या पूर्वाग्रहपूर्ण नहीं होना चाहिए।
अदालत ने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार को केवल आरोपों के आधार पर अयोग्य ठहराया जाता है, तो इसके समर्थन में ठोस सामग्री होनी चाहिए जिससे यह साबित हो सके कि उसने वास्तव में नैतिक अधमता वाला अपराध किया था।
समझौते को अपराध स्वीकार करना नहीं माना जा सकता
कोर्ट ने भर्ती अधिकारियों की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि समझौता करना अपराध स्वीकार करने के बराबर है।
अदालत ने कहा कि यह निष्कर्ष निकालना कि व्यक्ति ने समझौता इसलिए किया क्योंकि वह दोषी था, पूरी तरह तर्कहीन और आधारहीन है।
कोर्ट ने कहा कि जिस अपराध का आरोप लगाया गया था, वह विवाह के झूठे वादे पर धोखा देने से संबंधित था। ऐसे मामलों में यह साबित करने के लिए कि वास्तव में धोखा हुआ था, शिकायतकर्ता का अदालत में गवाही देना आवश्यक होता है।
जब शिकायतकर्ता स्वयं आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं थी और उसने समझौते के लिए सहमति दे दी थी, तब केवल आरोपों के आधार पर उम्मीदवार के चरित्र पर प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना उचित नहीं था।
प्री-मैरिटल संबंध आज सामान्य सामाजिक वास्तविकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वर्तमान समय में विवाह-पूर्व प्रेम संबंध आम बात हैं।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध अपने आप में किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में नकारात्मक धारणा बनाने का आधार नहीं हो सकता। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि हर प्रेम संबंध का विवाह में बदलना आवश्यक नहीं होता। केवल इसलिए कि कोई संबंध विवाह तक नहीं पहुंचा, यह मान लेना कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया, न्यायसंगत नहीं है।
निर्दोषता की संवैधानिक धारणा पर जोर
अदालत ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक उसे निर्दोष माना जाएगा।
इस मामले में शिकायतकर्ता ने स्वयं आरोपों को आगे नहीं बढ़ाया और समझौते के लिए सहमति दे दी। ऐसे में भर्ती अधिकारियों के पास उम्मीदवार के चरित्र पर संदेह करने का कोई वैध आधार नहीं था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष वयस्क थे, पड़ोसी थे और लगभग चार वर्षों तक एक-दूसरे को जानते थे। ऐसी परिस्थितियों में केवल आरोपपत्र के आधार पर उम्मीदवार को नैतिक रूप से दोषी नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती रद्द करने के आदेश को मनमाना करार देते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले को रद्द कर दिया।
अदालत ने एकल पीठ द्वारा पारित उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें उम्मीदवार के मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि सहमति से बने वयस्क संबंधों को नैतिक अधमता का आधार बनाकर किसी व्यक्ति के रोजगार या भविष्य को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
मामला
Gajula Thirupathi v. State of Telangana
प्रमुख कानूनी सिद्धांत
- सहमति से बने प्री-मैरिटल संबंध नैतिक अधमता (Moral Turpitude) नहीं हैं।
- समझौता (Compounding) अपने आप में अपराध स्वीकार करने के समान नहीं है।
- केवल आरोपों के आधार पर उम्मीदवार को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
- नियोक्ता का विवेकाधिकार मनमाना नहीं हो सकता और न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- जब तक अपराध सिद्ध न हो, निर्दोषता की धारणा लागू रहेगी।
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