कोमा में सैनिक के स्पर्म प्रिजर्वेशन को मंजूरी: हाईकोर्ट

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दुर्घटना के बाद सैनिक अपनी सहमति देने की स्थिति में नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने कोमा में सैनिक के स्पर्म रिट्रीवल और क्रायोप्रिजर्वेशन की अनुमति दी; कहा—प्रजनन अधिकार और मातृत्व Article 21 के तहत संरक्षित हैं।


एक संवेदनशील और जटिल मामले में Delhi High Court ने कोमा (vegetative state) में पड़े एक सैनिक के स्पर्म रिट्रीवल और क्रायोप्रिजर्वेशन की अनुमति देते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल “नए लिखित सहमति” (fresh consent) के अभाव में इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।


🔹 मामला क्या था

यह याचिका एक सैनिक की पत्नी द्वारा दायर की गई थी, जो जम्मू-कश्मीर में ड्यूटी के दौरान गंभीर मस्तिष्क चोट (traumatic brain injury) के बाद से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में है।

दंपति पहले ही IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के जरिए संतान प्राप्ति की योजना बना चुके थे।

हालांकि, दुर्घटना के बाद सैनिक अपनी सहमति देने की स्थिति में नहीं रहा, जिससे प्रक्रिया अटक गई।


🔹 कोर्ट का अहम फैसला

जस्टिस Purushaindra Kumar Kaurav ने 13 अप्रैल 2026 के आदेश में कहा कि:

  • पहले दी गई सहमति को वैध माना जाएगा
  • केवल ताजा लिखित सहमति के अभाव में प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि:

  • पत्नी की सहमति IVF प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है
  • यह सब लागू कानूनों और मेडिकल स्थिति के अधीन होगा
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🔹 मेडिकल बोर्ड की राय

Army Hospital (Research and Referral) के मेडिकल बोर्ड ने अदालत को बताया कि:

  • स्पर्म रिट्रीवल तकनीकी रूप से संभव है
  • लेकिन viable sperm मिलने की संभावना कम है
  • सैनिक सूचित सहमति (informed consent) देने की स्थिति में नहीं है

यह स्थिति Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 के तहत एक कानूनी चुनौती पैदा करती थी।


🔹 Article 21 और प्रजनन अधिकार

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि:

  • प्रक्रिया संबंधी नियम (procedural requirements)
    • मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते

Article 21 के तहत:

मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं।

इसलिए इन अधिकारों की व्याख्या “न्याय को आगे बढ़ाने” के दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।


🔹 पूर्व सहमति को मिला महत्व

कोर्ट ने माना कि:

  • सैनिक ने दुर्घटना से पहले IVF के लिए सहमति दी थी
  • उसकी बाद की असमर्थता (incapacity)
    • उस सहमति को निष्प्रभावी नहीं बना सकती

इसलिए पहले दी गई सहमति को ही पर्याप्त माना गया।


🔹 न्यायिक दृष्टांतों पर भरोसा

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि:

  • भारतीय कानून ऐसे मामलों में पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता
  • यदि परिस्थितियों में सहमति “युक्तिसंगत रूप से स्थापित” हो सके
    • तो प्रक्रिया की अनुमति दी जा सकती है

🔹 कोर्ट का निर्देश

अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि:

  • स्पर्म रिट्रीवल और क्रायोप्रिजर्वेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए
  • ताजा लिखित सहमति की अनिवार्यता पर जोर न दिया जाए
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🔹 कानूनी और सामाजिक महत्व

यह फैसला कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को छूता है:

  • क्या प्रजनन अधिकार व्यक्तिगत स्वायत्तता का हिस्सा हैं?
  • क्या पूर्व सहमति को बाद की अक्षमता के बावजूद मान्य माना जा सकता है?

कोर्ट ने इन सवालों का उत्तर देते हुए मानव गरिमा और व्यक्तिगत अधिकारों को प्राथमिकता दी है।


🔹 निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल चिकित्सा और कानून के जटिल संगम को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि मौलिक अधिकारों की व्याख्या मानवीय संवेदनाओं और न्याय के व्यापक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।


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