अंतरधार्मिक लिव-इन संबंध अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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धर्म परिवर्तन तभी अपराध होगा जब वह बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी, दबाव या विवाह/विवाह जैसे संबंध के माध्यम से कराया गया हो-इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरधार्मिक लिव-इन संबंध न तो अवैध हैं और न दंडनीय। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना जबरन धर्म परिवर्तन के UCRA लागू नहीं होगा और साथी चुनना अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है।


अंतरधार्मिक लिव-इन जोड़ों को बड़ी राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दो बालिग व्यक्तियों का अपनी इच्छा से साथ रहना न तो अपराध है और न ही इसे स्वतः धर्मांतरण कानून के उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने सुरक्षा की मांग करने वाली कई याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

यह फैसला Noori v. State of U.P. (निर्णय दिनांक 23 फरवरी 2026) में दिया गया।

पुलिस से सुरक्षा की मांग

याचिकाकर्ता अंतरधार्मिक लिव-इन जोड़े थे, जिन्होंने आरोप लगाया कि उनके परिवारजन और अन्य निजी प्रतिवादी उनके जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। पुलिस से संपर्क करने के बावजूद उन्हें संरक्षण नहीं मिला। ऐसे में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।

मुस्लिम कानून बनाम आपराधिक कानून

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने Kiran Rawat v. State of U.P. का हवाला दिया, जिसमें इस्लाम में विवाहपूर्व संबंधों को मान्यता नहीं दिए जाने की बात कही गई थी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता, 1860 या किसी अन्य कानून में ऐसे संबंधों के लिए कोड़े मारने या पत्थर मारकर हत्या जैसी सजा का कोई प्रावधान नहीं है।

अदालत ने साफ किया कि व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताएं आपराधिक दंड का आधार नहीं बन सकतीं।

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UCRA लागू कब होगा?

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 (UCRA) की धाराओं 3 और 5 की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन तभी अपराध होगा जब वह बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी, दबाव या विवाह/विवाह जैसे संबंध के माध्यम से कराया गया हो।

इन मामलों में न तो किसी जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप था और न ही धारा 4 के तहत कोई FIR दर्ज हुई थी। अदालत ने कहा कि केवल साथ रहने मात्र से UCRA का अपराध नहीं बनता। कानून अंतरधार्मिक विवाह या सहजीवन को प्रतिबंधित नहीं करता।

अनुच्छेद 21: साथी चुनने का अधिकार

कोर्ट ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं को हिंदू या मुस्लिम के रूप में नहीं बल्कि दो बालिग व्यक्तियों के रूप में देखती है, जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हैं। साथी चुनना और गरिमा के साथ जीवन जीना अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है।

अदालत ने Shakti Vahini v. Union of India का हवाला देते हुए कहा कि ऑनर किलिंग जैसे कृत्य व्यक्ति की गरिमा और पसंद के अधिकार पर हमला हैं। साथ ही K.S. Puttaswamy v. Union of India और Shafin Jahan v. Asokan K.M. के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जीवनसाथी चुनना निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि समान लिंग के दो व्यक्ति साथ रह सकते हैं, तो दो बालिग विपरीत लिंग के अंतरधार्मिक व्यक्तियों के सहजीवन पर परिवार या राज्य को आपत्ति का अधिकार नहीं।

समानता का सिद्धांत

अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि समान धर्म के लोग लिव-इन में रह सकते हैं, तो अलग धर्म के लोग भी रह सकते हैं। कानून सभी के लिए समान है।

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2019 का सरकारी आदेश बाध्यकारी

अदालत ने 31 अगस्त 2019 के राज्य सरकार के आदेश को भी दोहराया, जिसके तहत ऐसे जोड़ों की सुरक्षा के लिए पुलिस को खतरे का आकलन कर आवश्यक संरक्षण देना अनिवार्य है। आदेश का पालन न करने पर विभागीय कार्रवाई का प्रावधान है।

कोर्ट के निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए कहा:

  • याचिकाकर्ता खतरा होने पर पुलिस से संपर्क कर सकते हैं।
  • जबरन धर्म परिवर्तन का प्रयास होने पर शिकायत दर्ज की जा सकती है।
  • 31 अगस्त 2019 का सरकारी आदेश सख्ती से लागू होगा।
  • यह आदेश किसी वैधानिक जांच में बाधा नहीं बनेगा।
  • अदालत ने आयु संबंधी तथ्य पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया।

अदालत ने कहा, “मानव जीवन का अधिकार सर्वोच्च है। केवल अंतरधार्मिक संबंध में रहने से किसी नागरिक का मौलिक अधिकार समाप्त नहीं होता।”

यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि संवैधानिक नैतिकता सामाजिक आपत्तियों से ऊपर है और बालिग व्यक्तियों की पसंद का सम्मान राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।


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