सिज़ोफ्रेनिया के कारण सेवामुक्त सैनिक की विधवा को 40 साल बाद विकलांगता पेंशन देने का आदेश-केरल HC

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40 साल बाद सैनिक की विधवा को न्याय: केरल हाई कोर्ट ने दिलाई विकलांगता पेंशन

केरल हाई कोर्ट ने सिज़ोफ्रेनिया के कारण सेवामुक्त सैनिक की विधवा को विकलांगता पेंशन देने का आदेश बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि सामाजिक सुरक्षा कानूनों की उदार व्याख्या होनी चाहिए।

केरल हाई कोर्ट ने चार दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एक पूर्व सैनिक की विधवा के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने Armed Forces Tribunal (AFT) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सिज़ोफ्रेनिया के कारण सेना से सेवामुक्त किए गए दिवंगत जवान की पत्नी को विकलांगता पेंशन देने का निर्देश दिया गया था।

खंडपीठ में न्यायमूर्ति K Natarajan और न्यायमूर्ति Johnson John शामिल थे।

केंद्र सरकार ने फैसले को दी थी चुनौती

केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि सैनिक की बीमारी सैन्य सेवा के कारण उत्पन्न नहीं हुई थी और न ही सेवा के दौरान बढ़ी थी। इसी आधार पर सरकार ने AFT के आदेश को चुनौती दी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कानूनों की व्याख्या हमेशा उदार और लाभकारी तरीके से की जानी चाहिए।

“लाभकारी व्याख्या अपनाई जानी चाहिए”

26 मई को दिए गए आदेश में अदालत ने कहा:

“जब सामाजिक सुरक्षा कानूनों की व्याख्या की जाती है, तो उन्हें उदारतापूर्वक और लाभकारी अर्थ में पढ़ा जाना चाहिए। यदि किसी प्रावधान के दो संभावित अर्थ हों, जिनमें एक लाभ देता हो और दूसरा नहीं, तो लाभकारी अर्थ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”

अदालत ने कहा कि विकलांगता पेंशन से जुड़े प्रावधान एक “लाभकारी योजना” (Beneficial Scheme) का हिस्सा हैं और इन्हें तकनीकी आधारों पर सीमित नहीं किया जा सकता।

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सेना ने सिज़ोफ्रेनिया के कारण किया था डिस्चार्ज

मामले के अनुसार, महिला के पति अगस्त 1973 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। बाद में उन्हें सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित पाया गया और जुलाई 1979 में सेवा से मुक्त कर दिया गया।

सैनिक का निधन वर्ष 1994 में हो गया। इसके बाद उनकी विकलांगता पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया और रक्षा मंत्रालय में दायर अपील भी असफल रही।

मेडिकल बोर्ड की राय पर कोर्ट ने उठाए सवाल

हाई कोर्ट ने कहा कि सैनिक ने स्वयं सेवा छोड़ने का विकल्प नहीं चुना था, बल्कि मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित किया गया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में विकलांगता पेंशन से इनकार करने का भार संबंधित प्राधिकरण पर अधिक होता है।

कोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने यह निष्कर्ष तो दिया कि सिज़ोफ्रेनिया “जन्मजात” (Congenital) बीमारी थी, लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया।

सेवा के दौरान उत्पन्न बीमारी मानी जाएगी

अदालत ने Regulations for the Medical Services of the Armed Forces, 1983 के विनियमन 423(C) का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि भर्ती के समय किसी बीमारी का उल्लेख नहीं किया गया हो, तो सामान्यतः उसे सेवा के दौरान उत्पन्न बीमारी माना जाएगा।

सिर्फ तभी अपवाद लागू होगा जब चिकित्सकीय राय स्पष्ट रूप से यह बताए कि भर्ती के समय बीमारी का पता नहीं लगाया जा सकता था।

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में ऐसा कोई संतोषजनक कारण रिकॉर्ड पर नहीं था।

AFT ने पहले ही दिया था राहत का आदेश

सशस्त्र बल न्यायाधिकरण ने पहले अपने आदेश में कहा था कि मेडिकल बोर्ड का निष्कर्ष तर्कहीन और अपर्याप्त था। इसी आधार पर न्यायाधिकरण ने मृतक सैनिक को दो वर्षों के लिए 60 प्रतिशत विकलांगता दर के अनुसार पेंशन का पात्र माना था।

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अब हाई कोर्ट ने भी उसी निष्कर्ष को सही ठहराया है।

सैनिकों के अधिकारों पर अहम फैसला

यह फैसला सैन्यकर्मियों और उनके परिवारों के सामाजिक सुरक्षा अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि विकलांगता पेंशन जैसे मामलों में सरकार को कठोर तकनीकी रवैया अपनाने के बजाय मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

इससे पहले Punjab and Haryana High Court भी यह फैसला दे चुका है कि विकलांगता के कारण सेवामुक्त सैनिक, न्यूनतम 15 वर्ष की सेवा पूरी न करने के बावजूद, विकलांगता पेंशन पाने के हकदार हो सकते हैं।

चार दशक बाद मिला न्याय

करीब 40 वर्षों तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद आया यह फैसला न केवल एक सैनिक की विधवा के लिए राहत है, बल्कि उन हजारों पूर्व सैनिकों और परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है जो विकलांगता पेंशन संबंधी विवादों का सामना कर रहे हैं।

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