पूर्व कांग्रेसी मंत्री पी चिदंबरम का अपनी पार्टी के खिलाफ मुकदमा लड़ना अनैतिक था तो उसका वकीलों द्वारा विरोध गैरकानूनी था-

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भारत में कुछ समय से एक गलत प्रथा कि शुरुआत हो गयी हैं कि किसी आरोपी को मीडिया Media Trail में या जनता Public Trail के बीच ही दोषी करार दे दिया जाता है, जबकि यह काम न्यायालय का होता है. और कानून अंधा होता है, वह सिर्फ सबूत के आधार पर ही फैसला सुनाता है. कानून का आधार भी होता है कि जबतक न्यायालय किसी आरोपी को अपराधी घोषित नहीं करे, एक आरोपी को कानून की नज़रों में निर्दोष माना जाता है. इस तरह के गलत और गैरकानूनी विरोध में कांग्रेस पार्टी हमेशा से आगे रही है.

कलकत्ता हाई कोर्ट Calcutta High Court के बाहर जो हुआ वह निंदनीय है. कांग्रेस पार्टी Congress Party के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम P Chidambaram हाई कोर्ट में एक वकील के हैसियत से गए थे. चिदंबरम पेशे से वकील Advocate हैं. पश्चिम बंगाल सरकार West Bengal Government ने एक केस में उन्हें अपना वकील बनाया था. समस्या थी कि एक वकील की हैसियत से उन्हें अपनी पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी द्वारा दाखिल एक केस का जिरह करना था, जो उन्होंने किया भी. वह केस क्या है, उस बारे में चर्चा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि जिस तरह से वहां कांग्रेस पार्टी से जुड़े कुछ वकीलों ने उनका विरोध किया. चिदंबरम के खिलाफ नारेबाजी हुई और उन्हें काला झंडा दिखाया गया, जो विरोध करने का एक प्रतीक होता है.

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कांग्रेस पार्टी से जुड़े स्थानीय वकीलों की शिकायत थी कि कैसे पार्टी के एक वरिष्ठ नेता अपने ही पार्टी द्वारा दाखिल केस का विरोध कर सकते हैं. वैसे तो यह शिकायत वाजिब लगती है, पर यह अगर अनैतिक था तो गैरकानूनी कतई नहीं. चिदंबरम को ही इस बारे में सोचना होगा कि क्या उनका यह सही फैसला था. हम अक्सर सुनते हैं कि किसी केस से किसी जज ने अपने आप को अलग कर लिया है, यानि उस केस को सुनने से मना कर देते हैं. कारण होता है कि उनपर पक्षपात का आरोप ना लगे. वह केस उनके किसी सगे संबंधी से जुड़ा होता है या फिर किसी ऐसे व्यक्ति या कंपनी के खिलाफ होता है जुसके वह पूर्व में वकील रह चुके हैं. यह एक सही और सराहनीय प्रथा है, जो लम्बे समय से चली आ रही है.

चिदंबरम को वकालत करने की पूरी आज़ादी है-

कनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट Conflict of Interest के बारे में अक्सर सुना जाता है. इसका उपयोग वहां होता है जहां किसी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रूचि से प्रभावित होने की सम्भावना होती है. चिदंबरम को वकालत करने की पूरी आज़ादी है, पर उन्हें सोचना होगा कि क्या अपने ही पार्टी के खिलाफ केस लड़ना क्या सही है? अगर भविष्य में सुब्रमण्यम स्वामी चिदंबरम को नेशनल हेराल्ड केस National Herald Case में अपना वकील बनाने की पेशकश करते हैं तो क्या चिदंबरम उसे स्वीकार कर लेंगे तथा क्या वह दिल्ली हाई कोर्ट में सोनिया गांधी और राहुल गांधी कि जमानत रद्द करके उनकी गिरफ़्तारी कि मांग करेंगे? अगर नहीं तो फिर कलकत्ता हाई कोर्ट में उनकी उपस्थिति सही नहीं ठहराई जा सकती.

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वैसे ये कोई नई बात नहीं गुजरे दौर गौर करें तो सवाल उठता है कि क्या एनरॉन केस में पी. चिदंबरम ने जान-बूझकर भारत को हरवाया था और क्या कंपनी को मिले हर्जाने में भी बंदरबांट हुई थी ? इस विषय पर आगे जानकारी दी जाएगी—–“जब कांग्रेसी नेता पी चिदंबरम ने भारत देश के ही खिलाफ लड़ा केस और हरवाया था”-