लिक्विडेशन के बाद भी चेक बाउंस जिम्मेदारी कायम, सुप्रीम कोर्ट ने SLP खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी के लिक्विडेशन के बाद भी निदेशक की चेक बाउंस मामलों में जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश बरकरार।
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चेक बाउंस मामलों में निदेशकों की जिम्मेदारी को लेकर स्पष्टता दी है। कोर्ट ने Bombay High Court के आदेश को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
पीठ का गठन और फैसला
न्यायमूर्ति BV Nagarathna और न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की और पाया कि हाई कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है, जिससे हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
मामले की पृष्ठभूमि: चेक बाउंस विवाद
मामला एक ऋण लेनदेन से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता से ऋण लिया और भुगतान के लिए पोस्ट-डेटेड चेक जारी किया। यह चेक कंपनी की ओर से उसके निदेशक और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में जारी किया गया था।
चेक बाउंस के बाद आपराधिक मामला
चेक के अनादर (dishonour) के बाद शिकायतकर्ता ने Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज की। इस धारा के तहत चेक बाउंस को दंडनीय अपराध माना जाता है।
लिक्विडेशन के बाद विवाद गहराया
मामले के दौरान संबंधित कंपनी के खिलाफ लिक्विडेशन (विघटन) की कार्यवाही शुरू हो गई। इसके बाद आरोपियों ने यह तर्क देते हुए डिस्चार्ज (मुक्ति) की मांग की कि वे अब कंपनी के निदेशक नहीं रहे, इसलिए उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समाप्त हो गई है।
ट्रायल कोर्ट ने दी थी राहत
निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए आरोपियों को राहत दी और कहा कि लिक्विडेशन के बाद वे निदेशक नहीं रहे, इसलिए उन पर आपराधिक दायित्व नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने पलटा फैसला
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस निर्णय को पलटते हुए कहा कि Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के तहत लिक्विडेशन की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद, चेक बाउंस के मामलों में दायित्व समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 138 के तहत जिम्मेदारी जारी रहती है।
सुप्रीम कोर्ट की पुष्टि
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस दृष्टिकोण को सही ठहराया और कहा कि इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए यह संकेत दिया कि निदेशक अपने पद से हटने या कंपनी के लिक्विडेशन का हवाला देकर दायित्व से बच नहीं सकते।
कानूनी महत्व: जिम्मेदारी से बचाव नहीं
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहां कंपनियां दिवालिया या लिक्विडेशन की स्थिति में पहुंच जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि ऐसे हालात में भी चेक बाउंस से संबंधित आपराधिक जिम्मेदारी बनी रहती है।
केस संदर्भ
Abhaykumar Anandkumar Bhambore v. Ortho Relief Hospital and Research Centre, SLP (Crl.) No. 19823/2025, आदेश दिनांक 16 अप्रैल 2026।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कॉर्पोरेट और आपराधिक कानून के संगम पर एक अहम नजीर स्थापित करता है। यह स्पष्ट करता है कि वित्तीय अनुशासन और कानूनी जवाबदेही से बचने के लिए लिक्विडेशन का सहारा नहीं लिया जा सकता।
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