सुप्रीम कोर्ट ने कहा—चेक समय पर पेश न करना बैंक की लापरवाही है और यह उपभोक्ता कानून के तहत सेवा में कमी है। मुआवजा 10% से घटाकर 6% किया।
मामला: देरी से चेक प्रस्तुत करने पर विवाद
Supreme Court of India ने Canara Bank बनाम कविता चौधरी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि चेक को समय पर प्रस्तुत न करना बैंक की लापरवाही है और यह उपभोक्ता कानून के तहत “सेवा में कमी” (deficiency in service) माना जाएगा।
हालांकि, अदालत ने National Consumer Disputes Redressal Commission द्वारा निर्धारित 10% मुआवजे को अधिक मानते हुए इसे घटाकर 6% कर दिया।
पृष्ठभूमि: करोड़ों के चेक हुए ‘स्टेल’
मामला 2018 का है, जब उत्तरदाता ने अपने खाते में दो CTS चेक जमा किए थे, जिनकी कुल राशि ₹1.06 करोड़ से अधिक थी। ये चेक Assotech Limited द्वारा जारी किए गए थे।
बैंक ने पहले राशि क्रेडिट की, फिर “ऑनलाइन चेक रिटर्न” के नाम पर डेबिट कर दी। बाद में चेक “instrument outdated/stale” बताकर लौटा दिए गए, जिससे चेक की वैधता समाप्त हो गई।
उपभोक्ता फोरम का फैसला
उत्तरदाता ने Consumer Protection Act, 1986 के तहत शिकायत दर्ज की।
NCDRC ने माना कि बैंक की लापरवाही से चेक समय पर प्रस्तुत नहीं हुए, जिससे ग्राहक को भारी नुकसान हुआ। आयोग ने बैंक को कुल राशि का 10% मुआवजा और 8% ब्याज देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए तर्क दिया कि देरी “बैंक हड़ताल” जैसी परिस्थितियों के कारण हुई, जो उसके नियंत्रण से बाहर थीं।
बैंक ने Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 75-A का हवाला दिया, जिसमें ऐसी परिस्थितियों में देरी को माफ किया जा सकता है।
कोर्ट का विश्लेषण: “देरी खत्म होते ही कार्रवाई जरूरी”
न्यायमूर्ति B.V. Nagarathna और न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की पीठ ने कहा कि:
- बैंक चेक संग्रहण में ग्राहक का “एजेंट” होता है
- उस पर समयसीमा के भीतर चेक प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी है
- देरी यदि अपरिहार्य हो, तो कारण समाप्त होते ही “उचित समय” में चेक प्रस्तुत करना जरूरी है
अदालत ने पाया कि 2 जून 2018 एक कार्यदिवस था, लेकिन बैंक ने उस दिन चेक पुनः प्रस्तुत नहीं किया—जिसका कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया।
कानून की व्याख्या: सेवा में कमी क्या है?
कोर्ट ने Consumer Protection Act, 2019 की धारा 2(11) और 2(42) का हवाला देते हुए कहा कि सेवा में कमी में लापरवाही, त्रुटि या कर्तव्य पालन में कमी शामिल है, जिससे उपभोक्ता को नुकसान हो।
इस आधार पर कोर्ट ने बैंक की कार्रवाई को स्पष्ट रूप से “deficiency in service” माना।
अहम टिप्पणी: “बैंक की जिम्मेदारी तय”
अदालत ने कहा कि:
“यदि बैंक बिना उचित कारण के चेक को समय पर प्रस्तुत नहीं करता, जिससे वह स्टेल हो जाए, तो यह उसकी लापरवाही है।”
इससे यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि बैंकिंग सेवाओं में समयसीमा का पालन अनिवार्य है।
मुआवजे पर राहत: 10% से घटाकर 6%
हालांकि कोर्ट ने NCDRC के निष्कर्ष को सही माना, लेकिन मुआवजे की राशि को अधिक पाया।
कोर्ट ने कहा कि:
- नुकसान की प्रकृति “अनिश्चित” (indeterminate) है
- 10% मुआवजा वास्तविक हानि को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं करता
इसलिए मुआवजा घटाकर 6% कर दिया गया, साथ ही 6% वार्षिक ब्याज भी देने का आदेश दिया गया।
निष्कर्ष: बैंकिंग लापरवाही पर सख्त संदेश
यह फैसला स्पष्ट करता है कि बैंक ग्राहकों के प्रति fiduciary जिम्मेदारी निभाते हैं और किसी भी प्रकार की लापरवाही उन्हें कानूनी रूप से उत्तरदायी बना सकती है।
साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मुआवजा “उचित और संतुलित” होना चाहिए—न कि अत्यधिक।
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