दिल्ली हाईकोर्ट से महिला को अग्रिम जमानत, कहा- पति के सरेंडर न करने का खामियाजा पत्नी नहीं भुगतेगी

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  • राज्य सरकार का विरोध: पति फरार, धोखाधड़ी कायम
  • बचाव पक्ष की दलील: कार लौटाई जा चुकी, मामला सिविल प्रकृति का
  • “पति की वजह से पत्नी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती”

दिल्ली हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी मामले में महिला को अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि सह-आरोपी पति के सरेंडर न करने के आधार पर पत्नी की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती। कोर्ट ने मामले को प्रथम दृष्टया सिविल विवाद माना और नवजात शिशु के हितों को भी महत्वपूर्ण बताया।


₹41 लाख की मर्सिडीज डील से जुड़ा मामला

Delhi High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी मामले में सह-आरोपी पति ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद आत्मसमर्पण नहीं किया है, तो केवल इसी आधार पर पत्नी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज नहीं की जा सकती। न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नवजात शिशु के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए महिला को राहत प्रदान की।

यह आदेश न्यायमूर्ति Girish Kathpalia की एकलपीठ ने पारित किया।

मामला जनकपुरी थाने में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित था, जिसमें भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत अपराध दर्ज किया गया था।


शिकायतकर्ता का आरोप: कार ली, पैसे नहीं दिए

अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति शिकायतकर्ता के यहां कार्यरत थे। उन्होंने शिकायतकर्ता से ₹41 लाख में सेकेंड हैंड मर्सिडीज बेंज कार खरीदने का सौदा किया था। आरोप था कि कार की खरीद पत्नी के नाम पर दिखाई गई और बाद में वाहन को एक सह-आरोपी के माध्यम से हाथरस भेज दिया गया।

शिकायतकर्ता का कहना था कि न तो वाहन की कीमत चुकाई गई और न ही अदालत के निर्देशों के बावजूद कार लौटाई गई। पुलिस का दावा था कि वाहन याचिकाकर्ता महिला के कब्जे में रहा।


बचाव पक्ष की दलील: कार लौटाई जा चुकी, मामला सिविल प्रकृति का

महिला की ओर से अदालत को बताया गया कि विवादित वाहन पहले ही शिकायतकर्ता को वापस किया जा चुका है। इसके समर्थन में अदालत के समक्ष दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए, जिनसे स्पष्ट हुआ कि शिकायतकर्ता ने वाहन की रिकवरी के लिए एक सिविल मुकदमा दायर किया था, जिसे बाद में कार वापस मिलने के बाद वापस ले लिया गया।

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बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2026 में बच्चे को जन्म दिया है और उसके पास दो महीने का शिशु है। ऐसे में उसकी कस्टोडियल इंटरोगेशन न तो आवश्यक है और न ही न्यायसंगत।


राज्य सरकार का विरोध: पति फरार, धोखाधड़ी कायम

राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि महिला के पति की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी है और वह अब तक सरेंडर नहीं कर पाया है। अभियोजन ने यह भी तर्क दिया कि भले ही कार वापस कर दी गई हो, लेकिन बिक्री राशि अब तक अदा नहीं की गई, इसलिए धोखाधड़ी का अपराध अभी भी बना हुआ है।


हाईकोर्ट की टिप्पणी: यह प्रथम दृष्टया सिविल विवाद

कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों का अवलोकन करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह विवाद सिविल दायित्व का प्रतीत होता है। न्यायालय ने कहा कि पति ने पत्नी के नाम पर कार खरीदी, भुगतान नहीं किया और बाद में वाहन वापस कर दिया गया, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने अपना सिविल मुकदमा वापस ले लिया।

न्यायालय ने जांच एजेंसी के रवैये पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने नोट किया कि एफआईआर 16 जुलाई 2023 को दर्ज होने के बावजूद महिला की गिरफ्तारी के लिए पुलिस द्वारा किए गए प्रयास “छिटपुट और सीमित” थे। इससे यह संकेत मिलता है कि स्वयं राज्य भी याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को लेकर गंभीर नहीं था।

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“पति की वजह से पत्नी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती”

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल इसलिए महिला की अग्रिम जमानत खारिज नहीं की जा सकती क्योंकि उसके पति ने अपनी जमानत याचिका खारिज होने के बाद आत्मसमर्पण नहीं किया।

अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक संवैधानिक अधिकार है और उसे सह-आरोपी के आचरण के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि दो महीने के शिशु के हितों और देखभाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने महिला की अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में याचिकाकर्ता को ₹10,000 के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानती पर रिहा किया जाए।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निपटारे तक सीमित हैं और ट्रायल के दौरान किसी भी पक्ष को प्रभावित नहीं करेंगी।


मामला: Priyanshi Sharma v. State
निर्णय तिथि: 20 मई 2026

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