फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश के आधार पर उम्रकैद कैदी की रिहाई का सनसनीखेज मामला
बेंगलुरु की परप्पना अग्रहरा सेंट्रल जेल से फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश के आधार पर उम्रकैद कैदी की रिहाई का सनसनीखेज मामला सामने आया। 8 साल बाद जेल प्रशासन ने दर्ज कराया केस, जांच में अधिकारियों की भूमिका भी रडार पर।
Supreme Court of India के कथित फर्जी आदेश के आधार पर उम्रकैद की सजा काट रहे एक दोषी की रिहाई का मामला सामने आने के बाद Parappana Agrahara Central Prison का जेल प्रशासन और पुलिस महकमा सकते में है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह कथित फर्जीवाड़ा वर्ष 2018 में हुआ था, लेकिन करीब आठ साल बाद अब पूरे मामले का खुलासा हुआ है।
जेल प्रशासन ने दोषी और कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार करने में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
अपहरण और फिरौती मामले में काट रहा था उम्रकैद
जानकारी के अनुसार, शंकर ए नामक दोषी को वर्ष 2001 के एक अपहरण और फिरौती मामले में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 364A (फिरौती के लिए अपहरण) और धारा 120B (आपराधिक साजिश) के तहत दो-दो उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हालांकि अदालत ने दोनों सजाओं को साथ-साथ चलाने का निर्देश दिया था। इसके अतिरिक्त दोषी पर दोनों धाराओं में ₹5,000-₹5,000 का जुर्माना भी लगाया गया था।
फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश के आधार पर मिली रिहाई
जेल प्रशासन के मुताबिक, दिसंबर 2018 में उन्हें एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसे उस समय सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक आदेश समझा गया। यह पत्र कथित तौर पर एक आपराधिक अपील से जुड़ा हुआ था।
दस्तावेजों में यह दर्शाया गया था कि दोषी की रिहाई का निर्देश दिया गया है। जेल अधिकारियों ने दस्तावेजों को सही मानते हुए कार्रवाई की और शंकर ने ₹10,000 का जुर्माना जमा कर दिया। इसके बाद 13 नवंबर 2018 को उसे जेल से रिहा कर दिया गया।
वर्षों बाद शिकायतों से खुला फर्जीवाड़ा
मामले का खुलासा तब हुआ जब बाद के वर्षों में शिकायतें मिलने लगीं कि शंकर ने कथित तौर पर फर्जी न्यायालयी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर जेल से रिहाई प्राप्त की थी।
प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई गई कि सुप्रीम कोर्ट के नाम पर जारी किए गए आदेश पूरी तरह नकली थे और इस पूरी साजिश को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया।
जेल अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
मामले की गंभीरता को देखते हुए Karnataka Prison and Correctional Services के महानिदेशक ने आंतरिक जांच के आदेश दिए। इसके बाद संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेज बेंगलुरु दक्षिणी रेंज के उप महानिरीक्षक (DIG) जेल को विस्तृत जांच के लिए सौंपे गए।
जांच में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर फर्जी दस्तावेज जेल प्रशासन की प्रारंभिक जांच से कैसे बच गए। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि सुप्रीम कोर्ट के कथित आदेश की सत्यता की पुष्टि किए बिना दोषी को रिहा कैसे कर दिया गया।
सूत्रों के अनुसार, अब जेल अधिकारियों की संभावित लापरवाही या मिलीभगत की भी जांच की जा रही है।
अंदरूनी नेटवर्क की आशंका
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी आदेश तैयार करने और उन्हें जेल प्रशासन तक पहुंचाने में कौन-कौन लोग शामिल थे। जांच एजेंसियों को शक है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में किसी संगठित नेटवर्क या अंदरूनी मदद की भूमिका हो सकती है।
अधिकारियों का मानना है कि यदि यह साजिश साबित होती है, तो यह न्यायिक और जेल प्रशासनिक व्यवस्था में गंभीर सुरक्षा खामी को उजागर करेगा।
जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस घटना के सामने आने के बाद जेल प्रशासन की सत्यापन प्रक्रिया और दस्तावेज जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट जैसे संवेदनशील संस्थान के आदेशों की डिजिटल या आधिकारिक पुष्टि के बिना किसी दोषी की रिहाई बेहद गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाएगी।
फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने, उनका इस्तेमाल करने और दोषी की रिहाई में शामिल सभी लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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